Module 8   करेंसी, कमोडिटी और सरकारी सिक्योरिटीजChapter 6

EUR, GBP और JPY

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6.1 – करेंसी के दूसरे पेयर

पिछले कुछ अध्यायों में हमने USD INR  के बारे में काफी चर्चा की है, अब हम करेंसी के कुछ दूसरे पेयर को देखेंगे। जैसे EUR INR (यूरो रुपया), GBP INR (पाउंड रुपया), JPY INR (येन रुपया)। दूसरे करेंसी पेयर भी करीब-करीब वैसे ही काम करते हैं जैसे USD INR काम करता है। इसको आप इस तरीके से भी समझ सकते हैं कि अगर आपको यह पता है कि nifty50 के कॉन्ट्रैक्ट किस तरीके से काम करते हैं तो आप यह समझ सकते हैं कि निफ़्टी बैंक के कॉन्ट्रैक्ट किस तरीके से काम करेंगे। 

इस अध्याय में हम पहले जल्दी से हम इन करेंसी पेयर के कॉन्ट्रैक्ट के बारे में समझ लेते हैं और इस अध्याय के दूसरे हिस्से में हम कुछ ट्रेडिंग टेक्निक के बारे में बात करेंगे खासकर टेक्निकल एनालिसिस से जुड़ी तकनीक के बारे में। इसके बाद, करेंसी से जुड़ा हुआ हमारा यह अध्याय खत्म हो जाएगा और उसके बाद इस मॉड्यूल में हम कमोडिटी पर नजर डालेंगे। 

तो आइए शुरू करते हैं।

EUR INR

दुनिया में जिस करेंसी पेयर में सबसे ज्यादा कारोबार होता है वह है EUR USD लेकिन हमारे देश में यह कॉन्ट्रैक्ट उपलब्ध नहीं है हालांकि RBI ने एक्सचेंज को इस पेयर को भी लिस्ट करने के लिए हरी झंडी दे दी है और हो सकता है कि बहुत जल्दी यह पेयर EUR USD भी हमारे लिए उपलब्ध हो। साथ ही, GBP USD, JPY USD में भी हमें ट्रेड करने को मिल सकता है। लेकिन अभी के लिए हमारे पास ट्रेड करने के लिए EUR INR  मौजूद है। 

जैसा कि हमें पता है कि यूरो (EUR) यूरोपियन यूनियन की करेंसी है। बाकी किसी भी करेंसी से अलग, यूरो अकेली ऐसी करेंसी है जो किसी एक देश की अर्थव्यवस्था से नहीं बल्कि यूरोप के कई देशों की अर्थव्यवस्था से जुड़ी करेंसी है। 

EUR INR का कॉन्ट्रैक्ट करीब-करीब वैसा ही है जैसे USD INR का कॉन्ट्रैक्ट होता है। इससे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियों पर नजर डालते हैं 

विवरण EUR INR टिप्पणी
लॉट साइज € 1,000 इक्विटी डेरिवेटिव में लॉट साइज शेयरों की संख्या बताता है लेकिन यहां ये यूरो मे एक रकम होती है
अंडरलाइंग 1 EUR की भारतीय रूपए में कीमत
टिक साइज 0.25 पैसे या रूपयों में कहें तो INR 0.0025
ट्रेडिंग का समय सोमवार से शुक्रवार 9:00 AM से 5:00 PM
एक्सपायरी साइकिल 12 महीने तक का कॉन्ट्रैक्ट ध्यान दें कि इक्विटी डेरिवेटिव में 3 महीने तक की एक्सपायरी होती है 
ट्रेडिंग का अंतिम दिन महीने के अंतिम कारोबारी दिन से दो दिन पहले दोपहर 12:30 PM तक, इक्विटी डेरिवेटिव में एक्सपायरी के दिन  3:30 PM तक ट्रेड कर सकते हैं
सेटेलमेंट का अंतिम दिन महीने का अंतिम कारोबारी दिन
मार्जिन SPAN + Exposure आमतौर पर SAPN करीब 1.5%, और एक्सपोजर करीब 1%, होता है, इसलिए कुल मार्जिन करीब 2.5% होती है
सेटलमेंट कीमत अंतिम सेटेलमेंट के दिन का RBI रेफरेंस रेट  स्पॉट की क्लोजिंग कीमत

 

तो जैसा आप देख सकते हैं कि यह लगभग USD INR जैसा ही है। अंतर सिर्फ यह है कि EUR INR का लॉट साइज 1000 (यूरो) का है USD INR की तरह $1000 का नहीं। 

आइए देखते हैं कि इसकी वजह से मार्जिन पर क्या असर पड़ेगा। EUR INR के फ्यूचर का चित्र आप नीचे देख सकते हैं 

जैसा कि आप देख सकते हैं कि इस कॉन्ट्रैक्ट का लास्ट ट्रेडेड प्राइस (LTP/Last Traded Price) 74.8950 है। इसके सहारे हम कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू निकाल सकते हैं।

कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू = लॉट साइज * कॉन्ट्रैक्ट कीमत

= 1000 * 74.8950 

= 74,895.0

अगर हम यह मान लें कि मार्जिन करीब 2.5% है तो यह मार्जिन करीब 1870 होना चाहिए। आप चाहें तो ज़ेरोधा के मार्जिन कैलकुलेटर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं जिससे आपको सही मार्जिन पता चल जाएगी।

तो इसकी मार्जिन USD INR पेयर से कुछ ज्यादा है। लेकिन इक्विटी के डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट में लगने वाली मार्जिन के मुकाबले यह तब भी काफी कम है। 

GBP INR

हमारे देश में USD INR  के कॉन्ट्रैक्ट के बाद जिस कॉन्ट्रैक्ट में सबसे ज्यादा कारोबार होता है वह शायद GBP INR का कॉन्ट्रैक्ट है। इस कॉन्ट्रैक्ट में ज्यादातर चीजें वैसी ही है जैसी कि USD INR  के कॉन्ट्रैक्ट में होती हैं और यहां पर भी सिर्फ लॉट साइज और अंडरलाइंग का फर्क है। यहां पर अंडरलाइंग 1 GBP का एक्सचेंज रेट है और लॉट साइज 1000 पाउंड का है। कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू करीब करीब 89,345 का होगा, क्योंकि 5 अगस्त 2016 को फ्यूचर में ये 89.3450 पर ट्रेड हो रहा था।

तो जैसा आप नीचे देख सकते हैं इसके लिए मार्जिन भी थोड़ा ज्यादा है 

एक मजेदार बात जो आपको जानना चाहिए वो ये है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में GBP USD पेयर को केबल (cable) भी कहा जाता है। अगर आप किसी करेंसी ट्रेडर को केबल शॉर्ट करने के बारे में कहते सुने तो समझ जाइए कि वह GBP USD को शॉर्ट कर रहा है।

JPY INR

JPY INR का कॉन्ट्रैक्ट दूसरी किसी भी करेंसी कॉन्ट्रैक्ट के मुकाबले अलग है। इसमें लॉट साइज 1000 यूनिट का नहीं होता बल्कि 100000 यूनिट का होता है। यहां पर अंडरलाइंग 100 जापानी येन का एक्सचेंज रेट होता है। 

तो जब हम इस चित्र को देखते हैं 

तो हम 100 येन के रेट को देख रहे हैं जिसे भारतीय रुपए में दिखाया जा रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो, 100 जापानी येन खरीदने के लिए हमें 66.2750 रुपए खर्च करने पड़ेंगे। चूंकि लॉट साइज 100,000 का है तो यहां कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू होगी 

= (100,000 * 66.2750) / 100

= 66275

एक पिप की चाल पर इसका P&L  होगा 0.0025 * 1000 =₹ 2.5 ध्यान दें कि सभी INR पेयर के लिए ये P&L  यही है यानी एक जैसा ही है। 

JPY INR के लिए मार्जिन होगा 2808 रुपए जो कि करीब 4.2% बनता है।

तो इस तरह से JPY INR कॉन्ट्रैक्ट का मार्जिन करेंसी सेगमेंट में सबसे ज्यादा होता है और मेरे हिसाब से ऐसा इसलिए होता है क्योंकि यह सबसे ज्यादा वोलेटाइल कॉन्ट्रैक्ट है (क्योंकि इसमें लिक्विडिटी काफी कम होती है)। आप चाहें तो एक्सेल में JPY INR की वोलैटिलिटी पता कर सकते हैं। 

इन सभी करेंसी पेयर के स्प्रेड कॉन्ट्रैक्ट हर एक्सपायरी के लिए एक्सचेंज पर उपलब्ध हैं। आप नीचे NSE की वेबसाइट से लिया गए इस चित्र में इन्हें देख सकते हैं 

लेकिन जैसा आप देख सकते हैं कि USD INR के अलावा बाकी कोई भी स्प्रेड कॉन्ट्रैक्ट लिक्विड नहीं हैं मतलब उसमें लिक्विडिटी कम है। 

अगर आप कॉन्ट्रैक्ट में ट्रेड करने के लिए उसकी लिक्विडिटी देख रहे हैं तो मेरी सलाह यह होगी कि आप इस लिस्ट के आधार पर अपनी प्राथमिकता तय करें –

  1. USD INR फ्यूचर्स
  2. USD INR  ATM ऑप्शन्स
  3.  GBP INR फ्यूचर्स
  4. EUR INR फ्यूचर्स
  5. JPY INR फ्यूचर्स

अब मुझे उम्मीद है कि आपको करेंसी ट्रेडिंग से जुड़ी हुई ज्यादातर जानकारी मैंने दे दी है, अब हम ट्रेडिंग से जुड़े हुए कुछ तरीकों पर चर्चा करेंगे

6.2 – सीजनैलिटी का टेस्ट (क्या करेंसी ट्रेड का मौसम होता है)

करेंसी के बाजार में बहुत बार इस बात पर चर्चा होती है कि इस कारोबार में सीजन आते रहते हैं यानी तय वक्त पर ये बाजार एक तय तरीके से काम करता है। कहते हैं कि इसमें आप इन सीजन के हिसाब से ट्रेड कर सकते हैं। जैसे बाजार में बहुत सारे लोग ये बात करते हैं कि USD INR दिसंबर में नीचे जाता है या USD INR हमेशा एक्सपायरी के एक हफ्ते पहले ऊपर जाता है। बहुत सारे लोग अपने ट्रेड इन बातों के आधार पर करते हैं और ये जानने की कोशिश भी नहीं करते हैं कि सीजन के बारे में यह कथन सही है या नहीं। इसीलिए मुझे लगा कि हमें करेंसी के सीजनैलिटी (Seasonality) के बारे में थोड़ी चर्चा करनी चाहिए और इसको जांच भी लेते हैं। इसे जांचने के लिए हम हमने USD INR  के स्पॉट डेटा को लिया है। 

** चेतावनी **

अब जो चर्चा हम करेंगे वह तकनीकी चर्चा होगी, यह शायद Varsity के आम पाठक के लिए नहीं है। अगर आप इस बात का सीधा जवाब जानना चाहते हैं कि क्या करेंसी में ट्रेडिंग के अलग अलग मौसम होते हैं यानी क्या सीजनैलिटी होती है तो इसका सीधा जवाब है कि ऐसा कोई सीजन नहीं होता। इसके बाद, आप चाहें तो आप सीधे अध्याय के अगले अगले हिस्से पर जा सकते हैं। लेकिन अगर आप आंकड़ों से प्यार करते हैं तो आप आगे पढ़िए और मैं आपको समझाने और इसे छोटा रखने की पूरी कोशिश करूंगा।

इस विषय को पाठकों तक पहुंचाने के लिए मुझे अपने अच्छे दोस्त प्रकाश को धन्यवाद भी देना है। इस हिस्से से जुड़े किसी भी सवाल के लिए आप उसे [email protected] gmail.com पर लिख सकते हैं। 

किसी भी टाइम सीरीज की सीजनैलिटी को पता करने के लिए होल्ट विंटर टेस्ट (Holt Winters test) का इस्तेमाल किया जाता है जो कि एक सांख्यिकीय टेस्ट है। आमतौर पर Holt Winters मेथड यानी प्रणाली में 3 हिस्से होते हैं

  • लेवल 
  • ट्रेंड  
  • सीजनैलिटी 

लेवल – इस सूचकांक में USD INR में हुए औसत बदलाव को YoY यानी वर्ष दर वर्ष तौर देखा जाता है

ट्रेंड  – इस सूचकांक में USD INR में महीने दर महीने हुए औसत बदलाव को नापा जाता है

सीजनैलिटी – यह सूचकांक कीमत पर सीजन की वजह से हुए बदलाव को नापता है, उदाहरण के तौर पर, USD INR में हमेशा जनवरी में तेजी आती है, हमेशा अप्रैल में गिरावट आती है, जैसी बातें।

इन तीनों हिस्सों को ले कर दो स्थितियां बन सकती हैं-

  • एडिटिव (Additive) यानी जोड़ वाला
  • मल्टीप्लिकेटिव (multiplicative) यानी गुणा वाला

लेकिन मुझे लगता है कि ये चर्चा यहां जरूरी नहीं है।

सीजनैलिटी के लिए होल्ट विंटर टेस्ट (Holt-Winters test for seasonality) :

होल्ट विंटर टेस्ट में किसी भी टाइम सीरीज की सीजनैलिटी का पता लगाने के लिए अनुमान का एक मॉडल तैयार किया जाता है (मान लीजिए मॉडल 1) और फिर उसके नतीजों को देखा जाता है। मॉडल 1 में सीजनैलिटी का हिस्सा नहीं होता है। इसके बाद, एक और मॉडल बनाया जाता है जिसमें सीजनैलिटी को रखा जाता है और फिर इस मॉडल की गलतियों यानी ERROR को देखा जाता है।

हम दोनों मॉडल की गलतियों (ERROR) की तुलना करते हैं और फिर देखते हैं कि क्या हमें मॉडल 2 से मॉडल 1 के मुकाबले में बेहतर अनुमान मिल रहा है। इसके लिए हम ‘Chi Square’ टेस्ट का इस्तेमाल करते हैं तब पता चलता है कि किसमें सही नतीजे मिल रहे हैं। अगर म़ॉडल 2 में मॉडल 1 के मुकाबले बेहतर अनुमान मिलते हैं तो ये माना जाता है कि आंकड़ों में कुछ सीजनैलिटी का असर है। लेकिन अगर दोनों मॉडल में एक जैसे नतीजे मिलते हैं या मॉडल 1 में बेहतर नतीजे मिल रहे हों तो मान लिया जाता है कि कोई सीजनैलिटी नहीं है।

USD INR में सीजनैलिटी का नतीजा

साप्ताहिक सीजनैलिटी के लिए जांच 

मॉडल 1 (सीजनैलिटी के हिस्से के बगैर) – सबसे अच्छा मॉडल वो है (M,N,N) जिसका को एफिशिएंट 0.9999 है 

यह मॉडल बताता है कि साप्ताहिक डेटा में सिर्फ लेवल का हिस्सा होता है और ट्रेंड का हिस्सा नहीं होता। यहां लेवल का कोएफिशिएंट 0.9999 है मतलब अगले हफ्ते की कीमत इस हफ्ते की कीमत से 0.9999 गुना होगी 

जो पाठक रैंडम वॉक थ्योरी (Random Walk theory) के बारे में जानते हैं, वह इस को अच्छे से समझ सकेंगे। यह मॉडल हमें बता रहा है कि साप्ताहिक तौर पर USD INR की कीमत रैंडम वॉक के आधार पर चलती है। 

मॉडल 2 (सीजनैलिटी के हिस्से के साथ) – सबसे अच्छा मॉडल (M,N,M) वह है जिसका कोएफिशिएंट 0.7 और 0.0786 है। 

यह मॉडल बताता है कि इस साप्ताहिक डेटा में लेवल भी है और सीजनैलिटी भी है। यह मॉडल बताता है कि अगले हफ्ते की कीमत इस हफ्ते की कीमत का 0.7 गुना होगी और बाकी बचा हुआ हिस्सा सीजनैलिटी से आएगा। 

निष्कर्ष –  ‘Chi Square’ टेस्ट बताता है कि यहां 100% संभावना है कि मॉडल 2 और मॉडल 1 एक जैसे ही परिणाम दें, इसका मतलब यह हुआ कि USD INR में सीजनैलिटी का मॉडल लगाने से परिणाम बेहतर नहीं हो रहे हैं।

ऐसा तभी होता है जबकि डेटा में कोई सीजनैलिटी ना हो। क्योंकि यह डेटा साप्ताहिक एनालिसिस के लिए निकाला गया है इसलिए माना जा सकता है कि वीकली यानी साप्ताहिक तौर पर डेटा में कोई सीजनैलिटी नहीं होती। 

मंथली यानी मासिक सीजनैलिटी –

मॉडल 1 – सबसे बढ़िया मॉडल वो है (A,N,N) जिसका कोएफिशिएंट 0.9999 है 

वीकली डेटा की तरह, मंथली डेटा भी यही बताता है कि यह एक रैंडम वॉक है 

मॉडल 2 – इसमें सबसे बढ़िया वह मॉडल (A,N,A) है जिसका कोएफिशिएंट 0.9999 और 0.0001 है 

यह मॉडल दर्शाता है कि अगले माह की क्लोजिंग कीमत करीब करीब उतनी होगी जितनी इस महीने की क्लोजिंग कीमत है, और इसमें थोड़ा सा सीजनैलिटी का असर दिख रहा है। 

निष्कर्ष – ‘Chi Square’ टेस्ट बताता है कि करीब 20% संभावना यह है कि मॉडल 2 के परिणाम मॉडल 1 से ज्यादा सही हों। सांख्यिकी आधार पर देखें तो ऐसे बेहतर नतीजे रैंडमनेस की वजह से हो सकते हैं, जैसे कि, आपने कौन सा समय अवधि चुना है या कौन सा डेटा लिया है। 

आमतौर पर सांख्यिकी में यह माना जाता है कि मॉडल 2 के नतीजे को मॉडल 1 से बेहतर मानने के लिए 95% संभावना होनी चाहिए , तभी ये कहा जा सकता है कि इसमें सीजनैलिटी का असर है। इसका मतलब है कि USD INR में मंथली स्तर पर भी कोई सीजनैलिटी नहीं होती। 

इस जांच के लिए RBI की वेबसाइट से USD INR का पिछले 8 साल का डेटा लिया गया है। 

तो अब अगर आप किसी को यह कहता सुनें कि USD INR हमेशा क्रिसमस के पहले गिर जाता है तो आप जानते हैं कि उसकी बातों में कोई तथ्य नहीं है।

6.3 – क्लासिक टेक्निकल एनालिसिस 

किसी कंपनी के बारे में फंडामेंटल एनालिसिस करने पर हम क्या करते हैं, मान लीजिए हिंदुस्तान लीवर के लिए, हम पहले उसके बिजनेस के बारे में जानते हैं, फाइनेंशियल स्टेटमेंट देखते हैं, कॉरपोरेट गवर्नेंस देखते हैं और कौन सी कंपनियां से उसका मुकाबला है उनको देखते हैं, फिर उसके आधार पर एक फाइनेंशियल मॉडल बनाते हैं और तब यह तय करते हैं कि यह स्टॉक निवेश करने लायक है या नहीं। तो फंडामेंटल एनालिसिस सीधा सादा रास्ता होता है। लेकिन जब किसी करेंसी पेयर में निवेश की बात आती है, उदाहरण के लिए मान लीजिए USD INR  में, तो फंडामेंटल एनालिसिस में बहुत सारे आयाम जुड़ जाते हैं, USA की अर्थव्यवस्था में क्या हो रहा है, वहां के घरेलू हालात कैसे हैं, दुनियाभर के हालात कैसे हैं, उनका USA की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा, भारत की अर्थव्यवस्था के क्या हाल हैं, उसमें कौन सी चीजें हो रही हैं, घरेलू स्तर पर क्या-क्या हो रहा है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कौन सी चीजें हैं जो भारत पर असर डाल सकती हैं, आपको इन सब को समझना होगा और उन सब के असर को भी समझना होगा, उसके बाद ही कोई विचार आप बना सकते हैं। 

तो सच बात तो यह है कि यह आसान काम नहीं है और बहुत सारे लोग इसे नहीं कर सकते। आप अगर ट्रेडर हैं तो आपके पास एक अर्थशास्त्री का दिमाग होना चाहिए तभी आप फंडामेंटल एनालिसिस ठीक से करके करेंसी पेयर में ट्रेड कर पाएंगे। शायद यही वजह है कि करेंसी के बाजार में ज्यादातर लोग टेक्निकल एनालिसिस को ज्यादा पसंद करते हैं। शायद आपको पता हो टेक्निकल एनालिसिस में एक कीमत का अनुमान लगाया जाता है जो कि स्क्रीन पर दिख रहे कीमतों के आधार पर और बाजार में जितनी भी तरह की जानकारी मौजूद है, चाहे वह फंडामेंटल एनालिसिस ही क्यों ना हो, सब को जोड़ते हुए एक कीमत का अनुमान लगाया जाता है। इस अनुमान के आधार पर आप चार्ट की एनालसिस करते हैं और एक राय बनाते हैं। 

करेंसी और कमोडिटी में भी टेक्निकल एनालिसिस वैसे ही काम करती है जैसे यह इक्विटी में काम करती है। अगर आपको नहीं पता कि टेक्निकल एनालिसिस क्या होती है और कैसे काम करती है तो आपको टेक्निकल एनालिसिस से जुड़ा हमारा मॉड्यूल जरूर पढ़ना चाहिए। 

अब एक नजर डालिए टेक्निकल एनालिसिस के आधार पर तय किए गए कुछ एक ट्रेड पर

यहां घेर कर दिखाए गए दो कैंडलस्टिक पैटर्न वो हैं जिन्हें पियर्सिंग पैटर्न कहा जाता है। यह पैटर्न सुझाव देता है कि ट्रेडर को USD INR के पेयर में लॉन्ग जाना चाहिए। जैसा कि आप देख सकते हैं कि यह ट्रेड बहुत अच्छे तरीके से चला। यहां पर कोई स्टॉप लॉस भी ट्रिगर नहीं हुआ।

अब GBP INR  के बेयरिश मारूबोजू पर नजर डालिए। 

ये बेयरिश मारूबोजू आपको सलाह देता है कि आप उस अंडरलाइंग पर शॉर्ट जाएं और उम्मीद करें कि यह नीचे की ओर जाता रहेगा। 

इस तरह के और बहुत सारे उदाहरण हो सकते हैं। मुझे पता है कि बहुत सारे लोग यह मानते हैं कि करेंसी और कमोडिटी में ट्रेड करने के लिए आपको दूसरे तरीके की टेक्निकल एनालिसिस की जरूरत होती है। लेकिन यह सच नहीं है। टेक्निकल एनालिसिस एकदम उसी तरीके से काम करती है। उसको एक टाइम सीरीज का डाटा चाहिए होता है चाहे वह स्टॉक का हो, कमोडिटी का हो, करेंसी का हो या फिर बॉन्ड का हो। 

इसके साथ ही अब करेंसी पर अपनी इस चर्चा को यहीं खत्म करते हैं। अब मैं इसके अगले हिस्से यानी कमोडिटी ट्रेडिंग की तरफ अगले अध्याय से बढ़ूंगा।

इस अध्याय की मुख्य बातें 

  1. EUR INR का अंडरलाइंग भारतीय रुपए में 1 यूरो के स्पॉट रेट के बराबर होता है।
  2. EUR INR का लॉट साइज 1000 यूरो का होता है। 
  3. GBP INR का अंडरलाइंग 1 GBP का स्पॉट रेट रेट होता है (भारतीय रूपए में)। GBP INR का कॉन्ट्रैक्ट भारतीय करेंसी बाजार में बिकने वाला दूसरा सबसे बड़ा कॉन्ट्रैक्ट है। 
  4. GBP INR का लॉट साइज 1000 पाउंड होता है। 
  5. GBP USD के पेयर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केबल भी कहते हैं।
  6. JPY INR का मार्जिन सबसे ज्यादा होता है शायद इसलिए क्योंकि इसमें सबसे ज्यादा वोलैटिलिटी भी होती है। 
  7. JPY INR का लॉट साइज 100000 का होता है।
  8. JPY INR का अंडरलाइंग 100 जापानी येन के एक्सचेंज रेट के बराबर होता है। 
  9. लोगों को भले ही लगता हो कि USD INR में सीजन के हिसाब से ट्रेड कर सकते हैं लेकिन ऐसा कोई सीजन नहीं होता है, ना तो मासिक तौर पर और ना ही साप्ताहिक तौर पर।
  10. करेंसी में भी टेक्निकल एनालसिस का इस्तेमाल उसी तरीके से किया जा सकता है जैसे स्टॉक्स में किया जाता है।

1 comment

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  1. Chandan Kumar Singh says:

    varsity is too good

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