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Chapter 8

शॉर्टिंग क्या है

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8.1 – शॉर्टिंग संक्षेप में

शॉर्टिंग यानी शॉर्ट करना क्या है इसके बारे में हमने मॉड्यूल 1 में छोटी सी चर्चा की थी। अब इस अध्याय पर हम शॉर्टिंग के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में शॉर्टिंग जैसी कोई दूसरी चीज नहीं होती इसलिए इस सिद्धांत को समझना थोड़ा-सा मुश्किल होता है। उदाहरण के तौर पर मान लीजिए कि आप  X कीमत पर एक मकान खरीदना चाहते हैं और 2 साल बाद उसी मकान को Y कीमत पर बेचना चाहते हैं। इस सौदे में X और Y के बीच में जो अंतर होगा वही आपकी कमाई होगी। इसी तरीके से हम पहले कोई भी चीज खरीदते हैं और खरीदने के बाद ही उसे फायदे या नुकसान पर बेच पाते हैं। लेकिन शॉर्टिंग में इसका ठीक उल्टा होता है वहां हम पहले बेचते हैं और बाद में खरीदते हैं।

तो, बाजार में ऐसा क्या होता है जो ट्रेडर को पहले बेचने के लिए प्रोत्साहित करता है? इसका बहुत ही सीधा-सा जवाब है। जब हमें लगता है कि किसी चीज की कीमत ऊपर जाएगी तो हम पहले तो खरीद लेते हैं और बाद में कीमत बढ़ने पर उसको बेच देते हैं। इसी तरह जब हमें पता होता है कि कीमत नीचे जाने वाली है तो पहले बेचते हैं और कीमत कम हो जाने पर वापस इसे खरीद लेते हैं। 

इसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। मान लीजिए आप और आपका दोस्त बैठकर भारत और पाकिस्तान का क्रिकेट मैच देख रहे हैं। आपके और आपके दोस्त के बीच में शर्त लगती है। आपको लगता है कि भारत जीतेगा और आपके दोस्त को लगता है कि भारत हारेगा। इसका मतलब है कि अगर भारत मैच जीतता है तो आप पैसे कमाएंगे और अगर भारत मैच हार जाता है तो आपका दोस्त पैसे बनाएगा। अब इसी बात को स्टॉक मार्केट के नजरिए से देखिए। मान लीजिए कि भारत शेयर बाजार का एक स्टॉक  है। तो, अपनी शर्त में आप कह रहे हैं कि आपका स्टॉक यानी भारतीय टीम (स्टॉक) अगर ऊपर जाता है (टीम जीतती है) तो आपके पैसे बनेंगे। इसी तरीके से आपका दोस्त कह रहा है कि अगर भारतीय टीम (स्टॉक) नीचे जाएगा यानी भारतीय टीम हारेगी तो ऐसे में उसके पैसे बनेंगे। बाजार की भाषा में कहें तो आप भारतीय टीम पर लांग हैं और आपका दोस्त भारतीय टीम पर शॉर्ट है। 

इसके बाद भी आपके दिमाग में कई सवाल आ रहे होंगे। क्योंकि शॉर्टिंग को समझना इतना आसान नहीं है। अगर आप शॉर्टिंग के सिद्धांत के बारे में बिल्कुल नहीं जानते तो बस ये याद रखिए कि जब किसी स्टॉक या शेयर के नीचे जाने की संभावना होती है तो आप शॉर्ट करके पैसे बना सकते हैं। किसी शेयर या उसके फ्यूचर्स को शॉर्ट करने के लिए पहले उसे आप को बेचना होता है और बाद में आप उसे खरीदते हैं। वैसे इसे सीखने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप स्टॉक मार्केट में किसी शेयर को शार्ट करें और उससे होने वाले फायदे या नुकसान को झेलें। लेकिन आपके ऐसा करने के पहले मैं कोशिश करूंगा कि इस अध्याय में आपको वो सारी बातें बता सकूं जिसको आप को शॉर्ट करने के पहले जानना चाहिए।

8.2 – स्पॉट बाजार में शेयर की शॉर्टिंग

आप फ्यूचर्स मार्केट में जाकर शॉर्ट करें उसके पहले ये जानना चाहिए कि स्पॉट बाजार में शॉर्ट कैसे किया जाता है। एक स्थिति की कल्पना कीजिए- 

  1. एक ट्रेडर HCL टेक्नोलॉजीज लिमिटेड के डेली चार्ट को देखता है और उसे वहां पर एक बेयरिश मारूबोज़ू दिखता है।
  2. बेयरिश मारूबोज़ू के अलावा चेक लिस्ट की दूसरी सभी शर्तें भी पूरी होती हुई दिखती हैं। 
  • वॉल्यूम औसत से ज्यादा है 
  • रेजिस्टेंस लेवल मौजूद है 
  • इंडिकेटर्स भी इस बात की पुष्टि कर रहे हैं 
  • रिस्क-रिवार्ड रेश्यो संतोषजनक है 
  1. इन सब के आधार पर ट्रेडर को लगता है कि HCL टेक्नोलॉजीज अगले दिन 2% गिरेगा। 

तो, ट्रेडर इस गिरावट का फायदा उठाना चाहता है इसीलिए वह HCL टेक्नोलॉजीज को शॉर्ट करने का इरादा बनाता है। इस ट्रेड पर नजर डालते हैं-

स्टॉक HCL टेक्नोलॉजीज
ट्रेड का प्रकार शॉर्ट (पहले बेचना फिर खरीदना)
समय अवधि इंट्रा डे
कीमत Rs.1990/-
शेयरों की संख्या 50
टारगेट कीमत Rs.1950/-
% मुनाफे की उम्मीद 2.0%
स्टॉपलॉस Rs.2000/-
रिस्क Rs.10/-
रिवार्ड Rs.40/-

अब हमें पता है कि जब शेयर के गिरने की संभावना होती है तो मुनाफा कमाने की उम्मीद पर शेयर को या उसके फ्यूचर को शॉर्ट किया जाता है। ऊपर के टेबल में हमें दिख रहा है कि 1990 रुपये की कीमत पर स्टॉक को शार्ट करना है।

ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर जब आप शॉर्ट करना चाहते हैं, तो आपको सिर्फ उस स्टॉक को या उसके फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट को हाईलाइट करना होता है और उसके बाद F2 बटन दबाना होता है। ऐसा करते ही आपके सामने सेल ऑर्डर फॉर्म आ जाता है। अब आपको उसमें मात्रा भरनी है, दूसरी जानकारियां देनी है और सबमिट (Submit) कर देना है। जब आप सबमिट का बटन दबाते हैं तो ऑर्डर एक्सचेंज पर चला जाता है। जैसे ही यह सौदा पूरा होता है आपके लिए बाजार में एक शॉर्ट पोजीशन बन जाती है। 

अब जरा यह सोचिए कि आप जब एक ट्रेडिंग पोजीशन बनाते हैं तो आपको नुकसान कब होता है? आपको नुकसान तब होता है जब शेयर की कीमत आपके अनुमान के विपरीत दिशा में चली जाती है। 

  1. तो जब आप एक स्टॉक को शॉर्ट कर रहे हैं तो आप कीमत को किस दिशा में जाने की उम्मीद कर रहे हैं? 
    1. आपकी उम्मीद है कि शेयर की कीमत नीचे की तरफ जाएगी, 
  2. आपको नुकसान कब होगा? 
    1. जब शेयर की कीमत उलटी दिशा में जाने लगेगी 
  3. और वो दिशा कौन सी होगी? 
    1. जब आपके शेयर की कीमत नीचे जाने की जगह ऊपर की तरफ जाने लगेगी 

इसी वजह से जब आप शॉर्ट करते हैं तो इस सौदे का स्टॉपलॉस हमेशा ऊपर की तरफ होता है। इसीलिए ऊपर के टेबल में आप को दिख रहा होगा कि शॉर्ट के ट्रेड के लिए एंट्री कीमत है 1990 रुपए और स्टॉपलॉस है ₹2000 जो कि आप की एंट्री कीमत से ₹10 ज्यादा है। 

अब 1990 रुपए पर आपके शॉर्ट ट्रेड शुरू करने के बाद दो स्थितियां हो सकती हैं:

स्थिति 1 – स्टॉक की कीमत 1950 रुपए के टारगेट तक पहुंच जाती है 

इस स्थिति में स्टॉक की कीमत आपकी उम्मीद के हिसाब से चली है। स्टॉक नीचे गिरा है ₹1990 से गिरकर ₹1950 तक पहुंचा है और आप का टारगेट पूरा हो चुका है। ऐसे में ट्रेडर अपनी पोजीशन को बंद करेगा। जैसा कि हम जानते हैं कि जब ट्रेडर शॉर्ट पोजीशन बनाता है तो 

  1. पहले ₹1990 की कीमत पर बेचेगा
  2. उसके बाद ₹1950 की कीमत पर खरीदेगा। 

इस तरह से इस पूरी प्रक्रिया में ट्रेडर अपनी बेचने और खरीदने की कीमत के बीच के अंतर यानी ₹40 (1990-1950=40) की कमाई करेगा। 

समझने के लिए आप इसे ऐसे भी देख सकते हैं कि ट्रेडर ने 1950 रुपए पर खरीदा और 1990 रुपए पर बेचा और इस तरीके से ₹40 कमा लिए। बस यहां हो यह रहा है कि यह उल्टे तरीके से हो रहा है जहां पर पहले बेचा जा रहा और बाद में खरीदा जा रहा है। 

स्थिति 2 – स्टॉक की कीमत बढ़कर ₹2000 तक पहुंच जाती है 

इस स्थिति में स्टॉक की कीमत ऊपर चली गई है और याद रखिए कि आप शॉर्ट तब करते हैं जब आप सोचते हैं कि स्टॉक की कीमत नीचे जाएगी। आपको मुनाफा भी तभी होता है जब स्टॉक की कीमत नीचे जाती है। अगर स्टॉक की कीमत ऊपर चली गई तो आपको नुकसान होगा। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ है और ट्रेडर को नुकसान हो रहा है। 

  1. ट्रेडर ने 1990 रुपए की कीमत पर शार्ट किया था, शार्ट करने के बाद शेयर की कीमत ऊपर चली गई 
  2. कीमत ₹2000 तक पहुंच गई। स्टॉप लॉस भी आ गया। और अधिक नुकसान से बचने के लिए ट्रेडर को पोजीशन छोड़नी पड़ी और स्टॉक ऊँची कीमत पर खरीदना पड़ा।

इस पूरी प्रक्रिया में ट्रेडर को ₹10 (2000-1990=10) का नुकसान हुआ। इसको अगर आप पारंपरिक तरीके से यानी पहले खरीदने और बाद में बेचने के तरीके से देखेंगे तो यह ₹2000 पर खरीदना 1990 पर बेचने के बराबर है। बस यहां पर यह सब कुछ उल्टी दिशा में हो रहा है। 

अब आपको समझ में आ गया होगा कि कीमत नीचे जाने की स्थिति में शॉर्ट करने पर आप कैसे पैसे कमा सकते हैं।

8.3 – स्पॉट बाजार में शॉर्टिंग (स्टॉक एक्सचेंज के नजरिए से)

स्पॉट बाजार में शॉर्ट करने में एक बड़ी रुकावट है कि आप सिर्फ इंट्रा डे में ही शॉर्ट कर सकते हैं। मतलब अगर आपने शॉर्ट पोजीशन बनाई है तो उसी दिन बाजार बंद होने के पहले आपको शेयर खरीदकर अपनी पोजीशन स्क्वेयर ऑफ करनी होगी। इस शॉर्ट पोजीशन को अगले दिन तक नहीं ले जा सकते। ऐसा क्यों होता है इसको समझने के लिए हमें समझना होगा कि एक्सचेंज शॉर्ट पोजीशन को किस तरीके से देखता है।

शॉर्ट करते समय आप पहले बेच रहे होते हैं। जैसे ही आप यह शेयर बेचते हैं, वैसे ही बैकएंड (Backend) से स्टॉक एक्सचेंज को सूचना जाती है कि आपने फलां शेयर बेचा। उस समय एक्सचेंज को यह नहीं पता चलता कि आपने जो शेयर बेचा है वो  आपके डीमैट अकाउंट में है या नहीं। उनको यह लगता है कि आपने जो शेयर बेचा है वह आप शाम तक उन्हें डिलीवर करेंगे। अब ऐसा करने के लिए आपके डीमैट अकाउंट में अगले दिन वो शेयर होने चाहिए। एक्सचेंज को बाजार बंद होने के बाद ही यह पता चल पाता है कि आपने यह सौदा पूरा नहीं किया है। 

इस बात को दिमाग में रखते हुए, अब मान लीजिए कि आप ने एक स्टॉक को शॉर्ट किया है और आप उस की गिरती कीमत का फायदा उठाना चाहते हैं। अब अगर आप के शॉर्ट करने के बाद कीमत गिरती नहीं है और आप गिरावट के लिए एक दिन और इंतजार करना चाहते हैं। लेकिन बाजार बंद होने के बाद एक्सचेंज को पता चल जाएगा कि आपने जो शेयर बेचे हैं, वो शेयर आपके पास हैं ही नहीं। इस शेयर की डिलीवरी देने के लिए आपके पास शेयर होने चाहिए जबकि आपके पास यह डिलीवरी को पूरा करने के लिए शेयर है ही नहीं। इसका मतलब है कि आप अगले दिन डिफॉल्ट करेंगे। इस डिफॉल्ट के लिए बड़ी भारी पेनल्टी अदा करनी पड़ेगी। ऐसी स्थिति को शॉर्ट डिलीवरी कहते हैं। 

शॉर्ट डिलीवरी की स्थिति पैदा होने पर एक्सचेंज इस मामले को सेटल करने के लिए बाजार में ऑक्शन (नीलामी) करता है। आपको ऑक्शन बाजार के बारे में जानने के लिए आपको इस लेख को पढ़ना चाहिए जो ऑप्शन की प्रक्रिया को और पेनाल्टी के प्रक्रिया को पूरी तरीके से समझाता है। मैं आपको एक सलाह देना चाहता हूं कि कभी भी ऐसी स्थिति में नहीं पड़िए है जहां पर शॉर्ट डिलीवरी की हालत पैदा हो जाए। आपको हमेशा कोशिश करनी चाहिए कि आप अपने शॉर्ट ट्रेड को बाजार बंद होने के पहले क्लोज कर दें, नहीं तो, आपको 20% तक की रकम पेनल्टी के तौर पर चुकानी पड़ सकती है। 

अब एक बेहद जरूरी बात-  बाजार बंद होने के बाद ही एक्सचेंज ये जान पाता है कि किसने अपने सौदे पूरे नहीं किए हैं। एक्सचेंज ये पता करे इसके पहले आपको अपने शार्ट पोजीशन बंद (स्क्वेयर ऑफ) कर देनी होती है। इसी वजह से इंट्राडे के अलावा और किसी तरीके की शॉर्टिंग स्पॉट बाजार में नहीं की जा सकती है।

हां, अगर आप अपने शॉर्ट पोजिशन फ्यूचर्स बाजार में बनाते हैं तो आप इसको आसानी से कई दिनों तक अपने पास रख सकते हैं।

8.4 – फ्यूचर्स बाजार में शॉर्टिंग

फ्यूचर्स बाजार में शॉर्टिंग पर किसी तरीके की रोक नहीं है, शायद इसीलिए फ्यूचर्स बाजार में ट्रेडिंग इतनी ज्यादा लोकप्रिय है। याद रखिए कि फ्यूचर्स एक डेरिवेटिव इंस्ट्रूमेंट है जो कि अपने अंडरलाइंग की कीमत के आधार पर चलता है। अगर अंडरलाइंग एसेट की कीमत ऊपर या नीचे जा रही हो तो फ्यूचर्स की कीमत भी ऊपर या नीचे होगी। इसका मतलब है कि अगर आपकी किसी स्टॉक के बारे में मंदी की राय है तो आप उस पर शार्ट पोजीशन बना सकते हैं और अपनी पोजीशन को होल्ड कर सकते हैं। 

जिस तरीके से आप अपनी लांग पोजीशन के लिए मार्जिन जमा करते हैं और फिर पोजीशन बनाते हैं उसी तरीके से शॉर्ट पोजीशन के लिए भी आपको मार्जिन जमा करनी होगी। शॉर्ट और लांग दोनों के लिए मार्जिन एक तरह से ही लगती है उसमें कोई अंतर नहीं होता। 

जब आप फ्यूचर्स में शॉर्ट करते हैं तो मार्क टू मार्केट (M2M) में बदलाव कैसा नजर आता है?  इसको समझने के लिए एक उदाहरण पर नजर डालते हैं। मान लीजिए आप ने HCL टेक्नोलॉजीज को 1990 की कीमत पर शॉर्ट किया है। यहां लॉट साइज 125 का है। टेबल में आप देख सकते हैं कि स्टॉक की कीमत अगले कुछ दिनों में किस तरीके से बदलती है और उसका M2M पर क्या असर पड़ता है।

दिन M2M के लिए कीमत क्लोजिंग कीमत  दिन का P&L 
01 – (शॉर्ट की शुरूआत) 1990 1982 125 x 8 = 1000
02 1982 1975 125 x 7 + 875
03 1975 1980 125 x 5 = 625
04 1980 1989 125 x 9 = 1125
05 1989 1970 125 x 19 = 2375
06 – (स्क्वेयर ऑफ) 1970 1965 125 x 5 = 625

जो दो लाइनें लाल रंग से दिखायी गई हैं, वहां पर नुकसान हो रहा है। इस सौदे का कुल मुनाफा या नुकसान निकालने के लिए आपको सारे मार्क टू मार्केट वैल्यू को जोड़ना होगा – 

+1000+875-625-1125+2375+625

= 3125 रुपये

 या फिर हम 

(बेचने की कीमत – खरीदने की कीमत)× लॉट साइज 

= (19990 – 1965) × 125

= 3125 रुपये

आपने देखा कि फ्यूचर्स बाजार में जिस तरीके से लाँग की पोजीशन बनाई जाती है उसी तरीके से शॉर्ट की पोजीशन भी बनाई जाती है। अंतर सिर्फ यह है कि जब आप शॉर्ट की पोजीशन बनाते हैं तो कीमत गिरने से आपको फायदा होता है। मार्जिन की जरूरत और M2M की गणना में कोई अंतर नहीं होता। 

एक्टिव ट्रेडिंग में शॉर्टिंग एक बहुत ही आम बात है। अगर आपको ट्रेडिंग करनी है तो आपको लाँग ट्रेड के साथ-साथ शॉर्ट ट्रेड को करने की आदत डाल लेनी चाहिए। 

इस अध्याय की मुख्य बातें 

  1. शॉर्टिंग के लिए पहले आप बेचते हैं और बाद में खरीदते हैं। 
  2. शॉर्ट ट्रेड में आपको मुनाफा तब होता है जब क्लोजिंग कीमत आपकी खरीद कीमत या एंट्री कीमत से कम होती है।
  3. जब आप की शॉर्ट करने कीमत के मुकाबले कीमत ऊपर चली जाती है तब आपको नुकसान होता है।
  4. शॉर्ट ट्रेड में स्टॉपलॉस आप की शॉर्ट करने की कीमत से ऊपर होता है।
  5. स्पॉट बाजार में आप सिर्फ इंट्राडे में ही शॉर्ट कर सकते हैं।
  6. स्पॉट बाजार में शार्ट पोजीशन आप ओवरनाइट नहीं रख सकते।
  7. फ्यूचर्स बाजार में आप शार्ट पोजीशन आप ओवरनाइट होल्ड कर सकते हैं।
  8. शॉर्ट और लाँग दोनों ट्रेड में ही मार्जिन एक बराबर होती है। 
  9. शॉर्ट और लाँग ट्रेड दोनों ही मार्क टू मार्केट की गणना भी एक ही तरीके से होती है।

2 comments

  1. Laxman kanojiya says:

    Short position me future 24 jan 2020 essa hi ayega yeah iske liye koi dusra ayega

    • Kulsum Khan says:

      शॉर्टिंग फुटुरेस की अवधारणा समान है। इसमें कोई बदलाव नहीं होगा।

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