Module 8   करेंसी, कमोडिटी और सरकारी सिक्योरिटीजChapter 2

रेफरेंस रेट और घटनाओं का असर

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2.1 – दो नजरिया

जब आप किसी शेयर को खरीदते- बेचते हैं, मान लीजिए आप इंफोसिस खरीद या बेच रहे हैं, तो उस स्टॉक पर आपकी राय सीधी होती है, या तो आप उस पर तेजी में होते हैं या मंदी में होते हैं। लेकिन जब आप करेंसी पेयर (जोड़े) की बात कर रहे होते हैं, मान लीजिए अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपया (USD-INR) की, तो आपको दोनों तरफ की राय रखनी होती है- या तो आप अमेरिकी डॉलर खरीदना चाहते हैं या फिर आप भारतीय रुपए को खरीदना चाहते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर आप अमेरिकी डॉलर खरीद रहे हैं तो इसका मतलब है कि आप अमेरिकी डॉलर पर तेजी में हैं और भारतीय रुपए पर मंदी में हैं। 

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि एक करेंसी की कीमत हमेशा दूसरी करेंसी की तुलना में देखी जाती है। जैसे कि मैंने पिछले अध्याय में बताया था – बेस करेंसी (Base Currency) /  कोटेशन करेंसी (Quotation Currency) = कीमत 

दूसरे शब्दों में कहें तो यह फार्मूला हमें बताता है कि बेस करेंसी की एक यूनिट के बदले में कोटेशन करेंसी की कितनी यूनिट आपको मिलेगी। 

अगर आप एक करेंसी पेयर खरीदते हैं तो इसका मतलब है कि आप उसकी कीमत के ऊपर जाने की उम्मीद कर रहे हैं। इस उदाहरण को देखिए- USD-INR = 65, अगर आपको उम्मीद है कि इसकी कीमत 68 तक जाएगी तो आप इस जोड़े को खरीदेंगे। 

अगर इस जोड़े की कीमत ऊपर जाती है तो इसका मतलब यह है कि आगे जाते हुए बेस करेंसी की एक यूनिट के बदले आप कोटेशन करेंसी की ज्यादा यूनिट पा सकेंगे। इसका मतलब है कि एक अमेरिकी डॉलर के बदले आपको ज्यादा रुपए मिलेंगे।

तो, अगर करेंसी पेयर या जोड़े की कीमत ऊपर जाती है तो इसका मतलब है कि बेस करेंसी मजबूत हो रही है या ऊपर जा रही है जबकि कोटेशन करेंसी कमजोर पड़ रही है। इसका यह भी मतलब है कि आप बेस करेंसी पर तेजी में हैं और कोटेशन करेंसी को लेकर आपका नज़रिया मंदी का है। 

इसी तरीके से अगर आप अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपए के जोड़े को बेचते हैं तो इसका मतलब है कि आप को उम्मीद है कि बेस करेंसी अब कोटेशन करेंसी की कम यूनिट खरीद पाएगा। मतलब बेस करेंसी यानी अमेरिकी डॉलर में मंदी आएगी और और कोटेशन करेंसी यानी भीरतीय रूपये को लेकर आपका रुख तेजी का होगा। 

ऐसे में करेंसी के कमजोर पड़ने या मजबूत होने का मतलब होता है – 

  1. बेस करेंसी तब मजबूत मानी जाती है जब वो कोटेशन करेंसी की ज्यादा यूनिट खरीद सकती है। उदाहरण के तौर पर USD-INR  अगर 67 से 68 हो जाता है तो इसका मतलब है कि बेस करेंसी यानी अमेरिकी डॉलर मजबूत हो रहा है और कोटेशन करेंसी यानी भारतीय रुपया कमजोर हो रहा है। 
  2. कोटेशन करेंसी तब मजबूत होती है जब बेस करेंसी- कोटेशन करेंसी की कम यूनिट खरीद सकती है। उदाहरण के तौर पर अगर USD-INR 67 से 65 हो जाता है तो इसका मतलब है कि बेस करेंसी कमजोर हुई है और कोटेशन करेंसी मजबूत हुई है। 

ध्यान दीजिए कि एक करेंसी के कमजोर होने या मजबूत होने का मतलब है कि करेंसी बढ़ रही है या घट रही है। 

हम आगे बढ़े इसके पहले एक बात आपको जानना जरूरी है। किसी स्टॉक की तरह ही करेंसी के भी (करेंसी पेयर के भी) टू वे क्वोट (two way quote) होते हैं। यह टू वे क्वोट ही बताता है कि किस कीमत पर आप करेंसी (या करेंसी पेयर) को खरीद और बेच सकते हैं। टू वे क्वोट कोई ज्यादा मुश्किल चीज नहीं है यह सिर्फ साधारण तरीके के बिड और आस्क के रेट (Bid and Ask rate) हैं। लेकिन यहां ये जानना जरूरी है कि यह क्वोट काम कैसे करते हैं

नीचे के चित्र पर नजर डालिए-

ये एक फॉरेक्स ट्रेडिंग साइट पर दिए गए करेंसी के स्पॉट रेट हैं। यहां पर चर्चा के लिए मैंने यूरो – USD (Euro – USD) और GBP – USD के टू वे क्वोट (two way quote) को हाईलाइट किया है। आपको दिख रहा है कि किस कीमत पर आप करेंसी के इन पेयर को खरीद या बेच सकते हैं। 

उदाहरण के तौर पर अगर आप Euro /USD खरीदना चाहते हैं। तो आपको इसे आस्क (ask) कीमत पर यानी 1.1270 पर खरीदना होगा। जब आप इस पेयर को खरीदेंगे तो तकनीकी रूप से आप यूरो (Euro ) पर लॉन्ग है और USD पर शॉर्ट हैं। इसी तरीके से अगर आप इसे बेचना चाहते हैं तो आप इसे 1.1269 ( बिड कीमत) पर बेच सकते हैं। ऐसे में आप यूरो पर शॉर्ट होंगे और USD पर लॉन्ग होंगे। 

करेंसी को कई बार शॉर्ट फॉर्म में क्वोट किया जाता है। वास्तव में यह क्वोट करने का बहुत ही लोकप्रिय तरीका है। Euro /USD का टू वे क्वोट शॉर्ट या छोटे में ऐसे दिखाया जाएगा

EUR/USD – 1.1269/70.

आप देख सकते हैं कि इस में बिड कीमत को पूरा दिखाया गया है लेकिन आस्क कीमत को छोटे में सिर्फ आखिरी दो अंकों में दिखाया गया है। 

फॉरेक्स की भाषा में अंको को पिप्स (pips) कहा जाता है, अगर Euro /USD 1.1270 से 1.1272 पर चला जाता है तो इसका मतलब है कि यह पेयर या जोड़ा 2 पिप्स खिसक गया है।

2.2 – रेट यानी दर तय करना और बदलाव का तरीका

आज की तारीख में USD/INR का रेट 67.0737 है। यह कीमत हर दिन RBI द्वारा तय की जाती है। इसे RBI का रेफरेंस रेट या रेफरेंस कीमत कहते हैं। RBI हर दिन इसे अपनी वेबसाइट पर डालती है। करेंसी फ्यूचर की ट्रेडिंग के लिए RBI का रेफरेंस रेट एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। सभी सौदों के सेटलमेंट इस रेफरेंस रेट के आधार पर ही होते हैं। 

इस चित्र पर नजर डालिए- 

इस चित्र में RBI की वेबसाइट पर दिए गए 14 जून 2016 के रेफरेंस रेट को दिखाया गया है। ध्यान दीजिए कि यह स्पॉट रेट (स्पॉट कीमत) है, फ्यूचर रेट नहीं। फ्यूचर रेट यानी फ्यूचर कीमत NSE की वेबसाइट पर दी जाती है। 

यहां सवाल यह है कि RBI इस कीमत को कैसे तय करता है। 

 रेफरेंस रेट को तय करने का तरीका बहुत ही सीधा है और काफी पुराना भी है। इसमें एक पोलिंग (कई लोगों के मत) के जरिए रेफरेंस रेट को तय किया जाता है। RBI अपने रेफरेंस रेट को कैसे तय करता है इस जानकारी को देने वाला सर्कुलर आप यहां  Click here पढ़ सकते हैं। लेकिन अगर आप पूरा सर्कुलर नहीं पढ़ना चाहते हैं, तो हम इसको यहां संक्षेप में कुछ बिन्दुओं में बता देते हैं। 

  1. फॉरेन एक्सचेंज के बाजार में कारोबार करने वाले बैंकों में से कुछ को RBI ने बाजार में उनके मार्केट शेयर के आधार पर छांटा है, और उनकी एक लिस्ट तैयार की है। RBI इन बैंकों को कंट्रीब्यूटिंग बैंक (Contributing Bank) कहता है। 
  2. हर दिन सुबह 11:30 से 12:30 के बीच RBI इनमें से कुछ बैंकों (बिना किसी खास आधार पर चुने गए) को कॉल करता है। और उनसे USD INR के टू वे क्वोट मांगता है। 
  3. इन बैंको से रेट मिलने के बाद RBI बिड और आस्क की कीमतों का औसत यानी एवरेज निकालता है। 
  4. यही औसत कीमत यानी रेट उस दिन के लिए USD INR रेफरेंस रेट बनता है।
  5. छुट्टी के दिनों और वीकेंड के अलावा बाकी हर दिन इसी तरीके का इस्तेमाल होता है।

तो इतना सीधा सादा सा तरीका है रेफरेंस रेट निकालने का। 

लेकिन RBI इस तरीके को सिर्फ USD INR रेट के लिए इस्तेमाल करता है। बाकी सारी करेंसी जैसे EUR INR, GBP INR, JPY INR के लिए RBI एक अलग तकनीक का इस्तेमाल करता है जिसे क्रॉसिंग (Crossing) या क्रॉस रेट (Cross Rate) प्रणाली कहते हैं।

क्रॉसिंग की प्रणाली में एक करेंसी की कीमत दूसरी करेंसी के लिए सीधे-सीधे नहीं पता चलती। उदाहरण के लिए रूपए के लिए यूरो की कीमत क्या है, ये हमेशा उपलब्ध नहीं होता।  इसीलिए इस कीमत को एक कॉमन डिनॉमिनेटर से क्रॉस करना पड़ता है तब जा कर कीमत पता चलती है। 

आइए एक उदाहरण के जरिए इस को समझते हैं। मान लीजिए यूरो और भारतीय रुपए (EUR INR) के रेट को क्रॉसिंग के जरिए निकालना है और USD को कॉमन डिनॉमिनेटर माना गया है। 

तो सबसे पहले शुरू करते हैं USD INR के स्पॉट रेट को पता करने से। जैसा कि हमें ऊपर के चित्र से पता है कि यह स्पॉट कीमत है –

USD INR – 67.0737 

इस स्पॉट कीमत के लिए टू वे क्वोट कुछ इस तरीके से होगा। 

USD INR – 67.0730 / 67.0740 

इसका मतलब यह है कि अगर मुझे एक USD खरीदना है तो मुझे 67.0740 रूपए (INR) देना होगा और अगर मुझे एक USD बेचना है तो मुझे 67.0730 रुपए मिलेंगे। 

अब आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि EUR USD का स्पॉट रेट अंतरराष्ट्रीय बाजार में कितना है

ब्लूमबर्ग की साइट पर दिए गए टू वे क्वोट के हिसाब से यह कीमत है

EUR USD – 1.1134 / 40  

इसका मतलब यह हुआ कि एक यूरो- EUR को खरीदने के लिए मुझे 1.1140 (आस्क कीमत) USD देने होंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो एक EUR की कीमत 1.1140 USD होगी। अब अगर 1.1140 USD को मैं INR में बदल दूं तो मेरे पास एक यूरो खरीदने के लिए पर्याप्त रुपए होंगे और मुझे EUR INR की कीमत पता चल जाएगी। 

तो अब वापस USD INR के रेट पर आते हैं 

1 USD  = Rs 67. 0740

तो 1.1140 USD = कितने रुपए?

= 67.0740 * 1.1140

= 74.72044

तो एक यूरो के लिए हमें 74.72044 रुपए की जरूरत होगी मतलब कि EUR INR = 74.72044 

तो आप देख सकते हैं कि कैसे क्रॉसिंग तकनीक में USD एक धुरी की तरह काम करता है।

यहां पर आपके लिए एक छोटा सा अभ्यास, जैसे हमने क्रॉसिंग तकनीक का इस्तेमाल करते हुए EUR INR की आस्क कीमत निकाली है, क्या उसी तरीके से आप EUR INR की बिड कीमत निकाल सकते हैं। अपना जवाब हमें नीचे कमेंट में लिखिए। 

तो अब आप समझ गए होंगे कि रेफरेंस रेट और क्रॉस रेट हर दिन कंट्रीब्यूटिंग बैंक के उस दिन के रवैये के हिसाब से बदलते रहते हैं। अब यह सवाल उठता है कि कंट्रीब्यूटिंग बैंक का रवैया या रुख किस आधार पर बदलता है। 

इसका सीधा और सरल जवाब है – अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय घटनाओं के आधार पर।

2.3 – कौन सी घटनाएं असर डालती हैं

ऐसी घटनाओं के बारे में सोचिए जो कि स्टॉक के सेंटीमेंट पर असर डालती हैं। कंपनी के तिमाही नतीजे एक ऐसी ही घटना है। इस घटना की वजह से बाजार के सेंटीमेंट पर क्या असर पड़ेगा इसका अनुमान लगाना काफी आसान है। अगर तिमाही नतीजे अच्छे हैं तो सेंटीमेंट सुधरेगा और स्टॉक की कीमत ऊपर जाएगी। इसी तरीके से अगर तिमाही नतीजे खराब है तो सेंटीमेंट बिगड़ेगा और उसकी वजह से स्टॉक की कीमत नीचे जाएगी। मतलब की बात यह है कि यहां पर घटना और उसके असर में बहुत सीधा संबंध है। 

लेकिन इसके विपरीत जब करेंसी जोड़ों की बात आती है तो वहां ऐसा सीधा संबंध नहीं होता। इसी वजह से, किसी घटना का करेंसी पर क्या असर पड़ेगा  ये बता पाना थोड़ा मुश्किल काम है। इसीलिए करेंसी बाजार के फंडामेंटल कारण थोड़े मुश्किल होते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि करेंसी की कीमत हमेशा जोड़े में क्वोट होती है। तो जब कुछ घटनाएं किसी करेंसी जोड़े को मजबूत करती हैं, वहीं साथ ही कुछ ऐसी घटनाएं हो सकती हैं जो उस जोड़े को कमजोर बना रही हों। 

इस बात को समझाने के लिए मैं आपको एक उदाहरण देता हूं। मान लीजिए 2 आर्थिक घटनाएं एक साथ हो रही है। घटना 1 – भारत में लंबे समय के लिए विदेशी निवेश (FDI) का आना लगातार जारी है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ये एक अच्छी बात है। और इसकी वजह से रुपया मजबूत होगा। घटना 2 –  अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तेजी आ रही है (या कमोडिटी में गिरावट आ रही है) जिसकी वजह से USD मजबूत हो रहा है। 

अब ये दोनों घटनाएं एक साथ समानांतर तरीके से हो रही है। ऐसे में अमेरिकी डॉलर भारतीय रुपए का जोड़ा किस तरह चलेगा? जाहिर है कि इसका कोई सीधा जवाब नहीं है। यह करेंसी जोड़ा अब दोनों में से उस घटना के असर में आएगा जो कि ज्यादा मजबूत है और उसी दिशा में जाएगा। लेकिन जब तक ऐसा होता नहीं है तब तक बाजार में उठापटक जारी रहेगी। इसीलिए करेंसी के ट्रेड में सफल होने के लिए यह ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है कि आप दुनिया भर की घटनाओं पर नजर रखें और करेंसी जोड़े पर उनके असर को आंकते रहें। 

नीचे हम ऐसी कुछ घटनाओं पर की बात करेंगे जो जिनको आज इन पर आपको नजर रखनी चाहिए।

आयात निर्यात के आंकड़ेये आंकड़े बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं खासकर भारत जैसे देशों के लिए, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था ट्रेड डेफिसिट (Trade deficit) यानी व्यापार घाटे से काफी ज्यादा प्रभावित होती है। भारत सेवाओं और वस्तुओं का निर्यात करता है जैसे चावल और सॉफ्टवेयर, और कच्चा तेल, सोना चांदी जैसी कमोडिटी का आयात करता है। जब निर्यात बढ़ता है तो भारतीय करेंसी यानी रुपया मजबूत होता है और जब आयात बढ़ता है तो भारतीय करेंसी कमजोर पड़ती है। ऐसा क्यों होता है

जब आयात होता है (मान लीजिए कि कच्चा तेल का) तो इसके लिए हमें अंतरराष्ट्रीय बाजार में USD यानी अमेरिकी डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। इसकी वजह से हमें भारतीय रुपया बेचना होता है और अमेरिकी डॉलर खरीदना होता है। अब इस वजह से अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ती है और वो मजबूत होता है। 

करीब-करीब यही स्थिति एक्सपोर्ट में होती है जब हम निर्यात करते हैं तो हमें अमेरिकी डॉलर मिलता है। और हम अमेरिकी डॉलर को बेचकर उसको रुपए में बदलते हैं। जिस वजह से अमेरिकी डॉलर की सप्लाई बढ़ती है और रुपया मजबूत होता है।

व्यापार घाटा निर्यात यानी एक्सपोर्ट से ज्यादा आयात यानी इंपोर्ट होने पर करेंसी पर तुरंत असर दिखाई देता है, इसलिए इस पर नजर रखनी चाहिए।। आमतौर पर जब व्यापार घाटा कम होता है तो हमारी घरेलू करेंसी यानी रुपया मजबूत होता है। व्यापार घाटे को करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) भी कहते हैं। मेरी सलाह है कि आप इस  news piece समाचार को पढ़िए। जिससे आप इस विषय को अच्छे से समझ पाएंगे। 

ब्याज दरें आमतौर पर निवेशक ऐसे देशों में पैसे उधार लेते हैं जहां पर ब्याज दरें कम हों  और उन देशों में निवेश करते हैं जहां ब्याज दरें ऊपर हैं। इस तरह से वो ब्याज दरों में अंतर का फायदा उठाते हैं और कमाई करते हैं। इस तरह के कारोबार को कैरी ट्रेड (Carry Trade) कहते हैं। साफ है कि जिस देश में ब्याज दरें ऊपर हैं वहां पर ज्यादा विदेशी निवेश आता है और इस वजह से उस जगह की करेंसी में मजबूती आती है। इसका मतलब है कि ब्याज दरें करेंसी बाजार पर काफी ज्यादा असर डालती हैं और ट्रेडर इस पर नजर रखते हैं।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी RBI  या किसी भी दूसरे देश के सेंट्रल बैंक (जैसे अमेरिकी फेडरल रिजर्व या यूरोप में ECB) अपनी मॉनिटरी पॉलिसी यानी मुद्रा नीति की समीक्षा करते हैं और अपने देश में ब्याज दरों पर विचार करते हैं। इसीलिए मुद्रा नीति की समीक्षा पर इतना ज्यादा महत्व दिया जाता है। मुद्रा नीति में जो दरें घोषित की जाती हैं वो तो महत्वपूर्ण होती हैं लेकिन बाजार से जुड़े लोग यह भी देखते हैं कि सेंट्रल बैंक किस तरह की नीति अपना रहा है या उसका नजरिया कैसा है, वो ये भी देखते हैं कि मुद्रा नीति क्या संकेत दे रही है कि आगे चलते हुए सेंट्रल बैंक ब्याज दरों में किस तरह का रवैया रख सकता है?

डविश (Dovish) मतलब शांतिवादी – इस शब्द का इस्तेमाल इस बात को बताने के लिए किया जाता है कि देश का सेंट्रल बैंक आगे जाते हुए ब्याज दरों में कमी कर सकता है।  याद रखिए कि कम ब्याज ब्याज दरें आपकी घरेलू करेंसी को कमजोर बनाती हैं। यहां हम एक समाचार पत्र की हेडलाइन को दिखा रहे हैं जो यह बताता है कि डविश रूख और करेंसी में किस तरह का संबंध होता है

इस समाचार को पूरा पढ़ने के लिए यहां Click here क्लिक करें। 

हॉकिश (Hawkish) मतलब युद्धकारी  इस शब्द का इस्तेमाल इस बात को बताने के लिए किया जाता है कि सेंट्रल बैंक का रवैया ऐसा है जहां पर वह आगे जाते हुए यानी भविष्य में ब्याज दरों को बढ़ा सकता है। याद रखें कि ब्याज दरें ऊपर होने पर विदेशी निवेश देश में आता है और इस वजह से घरेलू मुद्रा मजबूत होती है। 

एक और समाचार को पढ़िए जो इस हॉकिश रवैये के बारे में चर्चा करता है।

इन्फ्लेशन या मुद्रास्फीति जैसा कि आप जानते हैं मुद्रास्फीति वह दर है जिस दर पर वस्तुओं और सेवाओं की कीमत बढ़ती है। अगर मुद्रास्फीति या महंगाई दर अधिक है तो इसका मतलब है कि जरूरी सामान की कीमत बढ़ रही है और इसकी वजह से आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर असर पड़ेगा। इसी वजह से, आम तौर पर सेंट्रल बैंक मुद्रास्फीति यानी इन्फ्लेशन को काबू में रखने की कोशिश करते हैं। मुद्रास्फीति और करेंसी के बीच का संबंध समझना थोड़ा मुश्किल है। 

मुद्रास्फीति को काबू में लाने के लिए सबसे सीधा तरीका होता है कि आप ब्याज दरों में बदलाव करें। अगर मुद्रास्फीति ऊपर है तो आमतौर पर सेंट्रल बैंक ब्याज दरें बढ़ाते हैं। 

जब आम आदमी यानी उपभोक्ता और कंपनियों को पैसे आसानी से मिलते हैं तो ये सब ज्यादा खर्च करते हैं, जब खर्च करने वाले बढ़ते हैं तो व्यापारी ज्यादा मुनाफा कमाने की कोशिश करते हैं और इस वजह से कीमतें तेजी से बढ़ती हैं और इस वजह से मुद्रास्फीति बढ़ती है। जब मुद्रास्फीति बढ़ती है तो सेंट्रल बैंक आमतौर पर ये कोशिश करते हैं कि मुद्रा की सप्लाई कम हो जाए और लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसे कम हों। इसका सबसे आसान तरीका होता है की ब्याज दरें बढ़ा दी जाए। 

इसीलिए जब मुद्रास्फीति बढ़ रही होती है तो सेंट्रल बैंक आमतौर पर ब्याज दरें बढ़ाते हैं। और जब ब्याज दरें बढ़ती हैं तो आमतौर पर घरेलू करेंसी मजबूत होती है।

इसीलिए मैंने पहले कहा है कि ब्याज दरों और करेंसी के बीच का संबंध समझना थोड़ा मुश्किल होता है। आम तौर पर, करेंसी बाजार के ट्रेडर मुद्रास्फीति के आंकड़ों पर नजर रखते हैं और यह जानने की कोशिश करते हैं कि अब सेंट्रल बैंक क्या करने वाला है और उसी आधार पर करेंसी में अपनी पोजीशन लेते हैं। 

इस बात को याद रखना ज़रूरी है। अगर मुद्रास्फीति ऊपर है तो सेंट्रल बैंक हॉकिश रूख अपनाएगा और उस वजह से घरेलू मुद्रा मजबूत होती है। इसी तरीके से, अगर मुद्रास्फीति कम है तो सेंट्रल बैंक डविश रूख अपनाएगा (सेंट्रल बैंक लोगों को खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करेगा) और ब्याज दरें कम करेगा, इस वजह से घरेलू मुद्रा कमजोर होगी। 

कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI/Consumer Price Index) यह एक ऐसा आंकड़ा है जो किसी निश्चित समय में कीमतों में हो रहे औसत बदलाव को बताता है। एक तरह से यह मुद्रास्फीति को नापने का तरीका है। CPI के बढ़ने का मतलब है कि मुद्रास्फीति बढ़ रही है और इसी तरह अगर CPI घट रही है तो इसका मतलब है कि मुद्रास्फीति कम हो रही है। आप इसके बारे में इस वेबसाइट website पर ज्यादा जानकारी पा सकते हैं। 

GDP (Gross Domestic Product/ ग्रॉस डॉमेस्टिक प्रोडक्ट) – किसी देश का GDP इस बात को बताता है कि उस देश में इस साल सामान और सेवाओं का कितना उत्पादन हुआ और इस सामान और सेवाओं की वहां की करेंसी में क्या कीमत है?  भारत में इसकी कीमत रुपए में आंकी जाती है और इससे भारत का GDP निकलता है। अब आप अनुमान लगा ही चुके होंगे की GDP एक बहुत बड़ी संख्या होती है और हर दिन की बातचीत में इस तरीके से GDP का आंकड़ा नहीं दिया जा सकता। इसीलिए आमतौर पर GDP को ग्रोथ रेट यानी वृद्धि दर के रूप में बताया जाता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी देश की GDP 7.1% है तो इसका मतलब है कि वहां का GDP नंबर 7.1% की रफ्तार से बढ़ रही है।

GDP की वृद्धि दर जितनी ज्यादा होगी, उतना ही ज्यादा उस देश पर निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और उस देश की करेंसी मजबूत होगी। 

वैसे वो सारी घटनाएं जो करेंसी पर असर डालती हैं उनकी लिस्ट बनाना संभव नहीं है क्योंकि वह एक अंतहीन सूची होगी। और आगे चलते हुए आपको यह भी समझ में आएगा कि हर तरह का आंकड़ा किसी न किसी तरीके से किसी दूसरी घटना से जुड़ा हुआ है। इसलिए आपको उन सभी आंकड़ों को उस तरह से जानने की जरूरत नहीं है जिस तरीके से कोई अर्थशास्त्री समझता है। आपको सिर्फ आंकड़ों के असर के बारे में जानना चाहिए और आंकड़े के पीछे की वजह को समझना चाहिए। इसीलिए मैंने करेंसी के ट्रेड के हिसाब से जो आंकड़े महत्वपूर्ण होते हैं उनकी सूची आपको बता दी है। मुझे लगता है कि यह एक अच्छा अच्छी शुरुआत है। 

इस अध्याय की मुख्य बातें

  1. बेस करेंसी अगर कोटेशन करेंसी की ज्यादा यूनिट खरीद सकता है तो यह कहा जाता है कि बेस करेंसी मजबूत हो रही है। 
  2. अगर बेस करेंसी से कोटेशन करेंसी की कम यूनिट खरीदी जा रही है तो इसका मतलब है कि बेस करेंसी कमजोर पड़ रही है। 
  3. जब आप किसी करेंसी पेयर या जोड़े पर लॉन्ग पोजीशन बनाते हैं तो इसका मतलब है कि आप बेस करेंसी पर लॉन्ग हैं और कोटेशन करेंसी पर शॉर्ट हैं। 
  4. जब आप करेंसी पेयर या जोड़े पर शॉर्ट होते हैं तो इसका मतलब है कि आप बेस करेंसी पर शॉर्ट हैं और कोटेशन करेंसी पर लॉन्ग है। 
  5. भारत के संदर्भ में USD INR यानी भारतीय रुपए के रेफरेंस रेट को RBI हर दिन तय करता है और इसके लिए वह कंट्रीब्यूटिंग बैंकों के बीच में एक पोल करता है।
  6. USD INR के अलावा दूसरी करेंसी के रेफरेंस रेट निकालने के लिए क्रॉसिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। 
  7. घटनाओं का करेंसी बाजार पर क्या असर पड़ता है, यह समझना थोड़ा मुश्किल काम है क्योंकि करेंसी को जोड़ों में क्वोट (Quote) किया जाता है और जोड़ों की दोनों करेंसी पर घटना का एक जैसा असर नहीं होता। 
  8. आमतौर पर जो घटना ज्यादा बड़ी होती है उसका असर करेंसी के जोड़े की दिशा पर असर पड़ता है। 
  9. जिन देशों में ब्याज दरें ज्यादा होती है वहां पर ज्यादा निवेश आता है और वहां की करेंसी ज्यादा मजबूत होती है। जिन देशों में ब्याज दरें कम होती हैं वहां पर इसका ठीक उल्टा होता है। 
  10. जिस देश में व्यापार घाटा कम होता है वहां की करेंसी मजबूत होती है। 
  11. मुद्रास्फीति या इन्फ्लेशन अगर ऊपर है तो वहां की करेंसी मजबूत होती है और इसी तरीके से मुद्रास्फीति नीचे जाने पर उल्टा असर पड़ता है। 
  12. घटनाओं के कारण और उसके असर को जानना करेंसी के ट्रेड में फायदेमंद होता है।

6 comments

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  1. Mayur panchal says:

    Ans of bid price EUR/INR = 74.68019 ( sahi ho to inform karna sir ji)

  2. Aman kaushik says:

    67.0730×1.1140=74.719322

    • Kulsum Khan says:

      क्या आप हमें बता सकते हैं आपने क्या कैलकुलेट किया है यहाँ पे ?

  3. Aman kaushik says:

    Is it okk or not?

  4. Nayan Alagiya says:

    74.6790
    Bid rate

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