Module 7   बाजार और टैक्सेशनChapter 5

ट्रेडर के लिए टैक्स

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5.1 – एक बार दोहरा लें 

पिछले अध्याय में हमने जाना – 

अगर आपने इक्विटी में अपने निवेश को 1 साल से ज्यादा रखा है तो आप उससे हुई आमदनी को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन दिखा सकते हैं और अपने आप को निवेशक का दर्जा दे सकते हैं। आप अपने आप को तब भी निवेशक मान सकते हैं जब शेयरों में आपका निवेश 1 दिन से ज्यादा और 1 साल से कम हो, ऐसे निवेश की कमाई को शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन दिखाया जा सकता है। हमने इस बात पर भी चर्चा की है कि अगर आप लगातार ट्रेडिंग करते हैं और इस निवेश/ट्रेडिंग से ही आपकी मुख्य कमाई होती है तो कैपिटल गेन को बिजनेस इनकम बताना क्यों फायदेमंद होता है। 

इस अध्याय में हम ट्रेडिंग से होने वाली कमाई को बिजनेस इनकम के तौर पर दिखाने से जुड़े सभी मुद्दों पर बात करेंगे। इन मुद्दों को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है –

  1. सट्टा व्यापार से होने वाली कमाई यानी स्पेक्यूलेटिव बिजनेस इनकम – इंट्राडे इक्विटी ट्रेडिंग से होने वाली कमाई को स्पेक्यूलेटिव या सट्टा कमाई कहते हैं। इसको सट्टा इसलिए कहा जाता है क्योंकि आप यह ट्रेड उन शेयरों की डिलीवरी लेने के इरादे से नहीं करते हैं। 
  2. गैर सट्टा व्यापार कमाई यानी नॉन स्पेक्यूलेटिव इनकम – F&O ट्रेडिंग से होने वाली कमाई को गैर सट्टा बिजनेस आमदनी माना जाता है। इसको गैर सट्टा इसलिए माना जाता है क्योंकि F&O का इस्तेमाल हेजिंग के लिए और अंडरलाइंग कॉन्ट्रैक्ट की डिलीवरी लेने और देने के लिए भी किया जाता है। वैसे, अभी भारत में इक्विटी, करेंसी और कमोडिटी के ज्यादातर F&O कॉन्ट्रैक्ट कैश में सेटल होते हैं, लेकिन इनकी परिभाषा यही है कि वो डिलीवरी लेने और देने के लिए काम आते हैं (सोने और बाकी कुछ कमोडिटी कॉन्ट्रैक्ट में डिलीवरी का विकल्प होता है)। छोटी अवधि (1 दिन से 1 साल तक) के डिलीवरी वाले इक्विटी ट्रेड से होने वाली कमाई को भी गैर सट्टा बिजनेस कमाई दिखाना फायदेमंद होता है अगर ऐसे सौदों की संख्या बहुत ज्यादा है और आपकी कमाई का यही मुख्य जरिया हैं।

5.2 – ट्रेडिंग या बिजनेस इनकम पर टैक्स 

बिजनेस इनकम पर कैपिटल गेन की तरह तय दर से टैक्स नहीं लगता। सट्टा व्यापार से होने वाली कमाई और गैर सट्टा बिजनेस इनकम को आप की दूसरी कमाई (जैसे वेतन, दूसरे बिजनेस इनकम, बैंक से मिलने वाला ब्याज, किराया और दूसरी चीजें) में जोड़ा जाता है और फिर इस कुल कमाई पर आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है। आप टैक्स दरों के लिए इस मॉड्यूल के पहले अध्याय को फिर से देख सकते हैं। आप वित्त वर्ष 2020-21 के लिए लागू टैक्स स्लैब के अध्याय 1 का उल्लेख कर सकते हैं।

मैं इसको एक उदाहरण से समझाता हूं: 

  • मेरा वेतन – ₹1000000 
  • डिलीवरी बेस्ड इक्विटी ट्रेड से होने वाला शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन – ₹100000 
  • F&O ट्रेडिंग से होने वाला मुनाफा – ₹100000 
  • इंट्राडे इक्विटी ट्रेडिंग से होने वाली कमाई – ₹100000 

साल की इस कमाई के आधार पर अब मेरा टैक्स कितना बनेगा? 

अपनी टैक्स देनदारी निकालने के लिए मुझे अपनी सभी तरह की कमाई, मेरा वेतन और बिजनेस इनकम (सट्टा और गैर सट्टा) को जोड़कर टैक्स योग्य रकम निकालनी होगी। इसमें मैं कैपिटल गेन को नहीं जोड़ सकता क्योंकि कैपिटल गेन के लिए एक निश्चित दर से टैक्स लगता है जबकि वेतन और बिजनेस इनकम के साथ ऐसा नहीं होता।

कुल आय (वेतन + बिजनेस इनकम) = ₹1000000 (वेतन) + ₹100000 (F&O ट्रेडिंग से होने वाला मुनाफा) + ₹100000 (इंट्राडे इक्विटी ट्रेडिंग से होने वाली कमाई) = ₹1200000

अब मुझे ₹1200000 पर टैक्स स्लैब के मुताबिक टैक्स देना है –

  • 0 – ₹250000 – कोई टैक्स नहीं
  • ₹250000 से ₹500000 – 10% टैक्स यानी ₹25000 
  • ₹500000 – ₹1000000 – 20% टैक्स यानी ₹100000 
  • ₹1,000,000 – ₹1,200,000 – 30% टैक्स यानी ₹60000  
  • इस तरह कुल टैक्स : ₹25000 + ₹100000 +₹60000 = ₹185000 

इसके अलावा मेरे पास ₹100,000 की शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन के तौर पर होने वाली कमाई भी है जिसे मैंने डिलीवरी वाले इक्विटी सौदों से कमाया है। इस पर 15% की दर से टैक्स लगेगा। 

शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन: ₹100000, अब इस पर 15% की दर से टैक्स बना ₹15000 

इस तरह मेरा कुल टैक्स = ₹185000 +₹15000 = ₹200000 

मुझे उम्मीद है कि इस उदाहरण से आपको समझ में आ गया होगा कि अपनी कुल आमदनी और उसके आधार पर अपनी टैक्स देनदारी को आप कैसे निकाल सकते हैं। 

अब हम ट्रेडिंग से होने वाली कमाई को टैक्स के लिए बिजनेस इनकम के तौर पर दिखाने से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर नजर डालते हैं।

5.3 – बिजनेस लॉस को कैरी फॉरवर्ड करना 

अगर आप अपना इनकम टैक्स सही समय पर भरते हैं, नॉन ऑडिट मामले के लिए ये तारीख 31 जुलाई और ऑडिट वाले मामलों के लिए 30 सितंबर है, तो आप अपने बिजनेस लॉस को कैरी फॉरवर्ड कर सकते हैं। 

सट्टा यानी स्पेक्यूलेटिव नुकसान को आप 4 साल तक कैरी फॉरवर्ड कर सकते हैं और इसको किसी भी सट्टा कमाई यानी स्पेक्यूलेटिव गेन के सामने ऑफ सेट कर सकते हैं। 

गैर सट्टा नुकसान को आप वेतन के अलावा किसी भी दूसरी बिजनेस इनकम के साथ उसी साल सेट ऑफ कर सकते हैं। यानी आप बैंक के आमदनी से ब्याज से होने वाली कमाई, किराए से होने वाली कमाई, कैपिटल गेन जैसी चीजों के साथ आप इसे उसी साल सेट ऑफ कर सकते हैं। 

गैर सट्टा नुकसान को अगले 8 साल तक की कैरी फॉरवर्ड कर सकते हैं लेकिन याद रखिए कि कैरी फॉरवर्ड किया गया गैर सट्टा नुकसान सिर्फ गैर सट्टा कमाई के सामने ही ऑफ सेट किया जा सकता है। 

उदाहरण के तौर पर मान लीजिए मुझे होटल के बिजनेस से 1,500,000 रुपए की कमाई हुई है, ब्याज से मुझे ₹200,000 की कमाई हुई है और सट्टा व्यवसाय में ₹700,000 का नुकसान हुआ है। ऐसे में, मेरी टैक्स देनदारी होगी –

बिजनेस से मेरी कमाई 1,500,000 और ब्याज से कमाई 200,000 है। कुल मिलाकर 1,700,000 

गैर सट्टा बिजनेस से मुझे ₹700,000 का नुकसान हुआ है, जिसे मैं बिजनेस कमाई या बिजनेस इनकम के सामने ऑफ सेट कर सकता हूं। इससे मेरी टैक्स देनदारी कम हो सकती है। इसलिए 

मेरी कुल टैक्स देनदारी = ₹1,700,000 – ₹700,000 = ₹1,000,000 

इस तरह से अब मैं केवल ₹1,000,000 पर ही टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स दूंगा

  • 0 – ₹250000 – कोई टैक्स नहीं
  • ₹250000 से ₹500000 – 10% टैक्स यानी ₹25000 
  • ₹500000 – ₹1000000 – 20% टैक्स यानी ₹100000 

इस तरह कुल टैक्स : ₹25000 + ₹100000 = ₹125000 

5.4 – सट्टा और गैर सट्टा बिजनेस आमदनी को ऑफ सेट करना 

सट्टा आमदनी (इंट्राडे ट्रेडिंग) में होने वाले घाटे को गैर सट्टा यानी F&O से होने वाले फायदे के साथ ऑफसेट नहीं किया जा सकता, लेकिन सट्टा आमदनी में हुए फायदे को गैर सट्टा नुकसान के साथ ऑफसेट किया जा सकता है। 

अगर आप इंट्राडे इक्विटी में किसी साल ₹100,000 का सट्टा नुकसान करते हैं और उसी साल गए गैर सट्टा व्यवसाय में ₹100,000 का फायदा करते हैं तो आप इन दोनों को एक साथ दिखा कर जीरो मुनाफा नहीं बता सकते। आपको ₹100,000 के गैर सट्टा मुनाफे पर टैक्स देना पड़ेगा। सट्टा व्यवसाय से होने वाले नुकसान को आप कैरी फॉरवर्ड कर पाएंगे। 

उदाहरण के लिए, अगर 

  • वेतन से होने वाली आमदनी = ₹500000 
  • गैर सट्टा मुनाफा = ₹100000 
  • सट्टा व्यवसाय में हुआ नुकसान = ₹100000 

अब मैं अपने टैक्स की देनदारी को निकालता हूं 

कुल आय = वेतन से होने वाली आय + गैर सट्टा व्यवसाय से होने वाली आय 

  • = ₹500000 + ₹100000 = ₹600,000 

इस तरह मुझे ₹600000 पर टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स देना होगा 

  • 0 – ₹250000 – कोई टैक्स नहीं
  • ₹250000 से ₹500000 – 10% टैक्स यानी ₹25000 
  • ₹500000 – ₹600000 – 20% टैक्स यानी ₹20000 

इस तरह कुल टैक्स हुआ ₹45000 

मैं सट्टा व्यवसाय में हुए ₹100,000 के नुकसान को कैरी फॉरवर्ड कर सकता हूं, जिसको मैं आगे के 4 सालों में कभी भी किसी नुकसान के सामने सेट ऑफ कर सकता हूं। यहां पर यह बात फिर से दोहराना जरूरी है कि सट्टा व्यवसाय से होने वाले घाटे को केवल सट्टा व्यवसाय से होने वाले फायदे के साथ ही ऑफ सेट किया जा सकता है, चाहे उस साल में या आगे के सालों में। सट्टा व्यवसाय से होने वाले नुकसान को किसी दूसरे तरीके के बिजनेस आमदनी से ऑफसेट नहीं किया जा सकता। 

लेकिन अगर मैंने सट्टा व्यवसाय से ₹100,000 की आमदनी की है और गैर सट्टा व्यवसाय में ₹100,000 का नुकसान किया है, तो इन दोनों को एक दूसरे के साथ ऑफ सेट किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में ऊपर के उदाहरण में मुझे केवल ₹500,000 के वेतन से हुई कमाई पर टैक्स देना होगा।

5.5 – टैक्स लॉस हार्वेस्टिंग (Tax Loss Harvesting) क्या होती है?

हो सकता है कि वित्त वर्ष के अंत में आपको पता चले कि आपने अपना मुनाफा तो ले लिया है लेकिन आपके नुकसान अभी अप्राप्त (सामने नहीं आए) हैं। अगर आप इस पर ध्यान नहीं देंगे तो आप अपने रियलाइज्ड (प्राप्त) मुनाफे पर टैक्स दे देते हैं जबकि आपको अनरियलाइज्ड (अप्राप्त) घाटे को अगले साल के लिए कैरी फॉरवर्ड करना पड़ सकता है। इसकी वजह से उस समय आपकी टैक्स की देनदारी बढ़ जाती है, और उस टैक्स की रकम न देकर आप उस रकम पर जो ब्याज कमा सकते थे वह ब्याज चला जाता है। 

आप चाहें तो अपने टैक्स देनदारी को बहुत आसानी से आगे के लिए टाल सकते हैं, बस आपको अनरियलाइज्ड (अप्राप्त) घाटे को तुरंत बुक करना होगा। घाटा बुक कर के आप वित्त वर्ष के लिए अपनी टैक्स देनदारी को कम कर सकते हैं। जेरोधा शायद देश में अकेली ब्रोकरेज कंपनी है जो कि आपको टैक्स लॉस हार्वेस्टिंग की रिपोर्ट देता है जिसके आधार पर आप आसानी से अपने घाटे को हार्वेस्ट करने के हर मौके को पहचान सकते हैं। ज्यादा जानकारी के लिए यहां क्लिक करें।

5.6 – BTST (ATST) – यह सट्टा है या गैर सट्टा है या STCG?

बाय टुडे सेल टुमॉरो (Buy Today Sell Tomorrow – BTST) या एक्वायर टुडे सेल टुमॉरो (Acquire Today Sell Tomorrow – ATST) का इस्तेमाल बहुत सारे इक्विटी ट्रेडर करते हैं। जब आप स्टॉक की डिलीवरी लिए बगैर उसको आज खरीदते हैं और कल बेचते हैं तो उसे BTST कहा जाता है। 

क्योंकि ऐसे ट्रेड में आप शेयरों की डिलीवरी नहीं ले रहे हैं तो क्या इस ट्रेड को इंट्रा डे ट्रेड की तरह से सट्टा माना जाए? 

इसको लेकर दो विचारधाराएं चलती हैं, एक का मानना है कि क्योंकि यहां पर डिलीवरी नहीं ली जा रही है इसलिए यह एक तरह से सट्टा व्यवसाय है, लेकिन मैं दूसरी विचारधारा को मानता हूं जो यह कहती है कि यह गैर सट्टा है क्योंकि एक्सचेंज खुद इस ट्रेड पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स लगाता है, जैसे कि डिलीवरी आधारित सौदों पर लगता है। यहां पर बस ध्यान देने वाली बात यह है कि 1 BTST सौदे साल में कितनी बार किए जा रहे हैं, अगर इनकी संख्या कम हैं तो इसे शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन माना जाना चाहिए, लेकिन अगर BTST लगातार और बार-बार किए जा रहे हैं तो यह सट्टा व्यवसाय वाली आमदनी होनी चाहिए।

5.7 – बिजनेस इनकम – एडवांस टैक्स 

जब आप बिजनेस इनकम दिखाते हैं तो इस पर एडवांस टैक्स देना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। जैसा कि हम पिछले अध्याय में चर्चा कर चुके हैं कि हर साल 15 जून तक एडवांस टैक्स का 15%,  15 सितंबर तक 45%, 15 दिसंबर तक 75%, और 15 मार्च तक 100% देना होता है। यहां एक सवाल आ सकता है कि यहां यह प्रतिशत किस चीज का प्रतिशत दिखाता है 

यह है आपके सालाना टैक्स का प्रतिशत। जब आप बिजनेस इनकम दिखाते हैं तो आपको अपना ज्यादातर टैक्स 31 मार्च को साल खत्म होने के पहले दे देना होता है। ट्रेडिंग की आमदनी को बिजनेस इनकम दिखाने का यह एक बड़ा मुद्दा है, क्योंकि हो सकता है सितंबर तक आपने ट्रेडिंग से काफी अच्छी कमाई की हो लेकिन उसके आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि वित्त वर्ष के अंत तक वैसी ही कमाई करते रहेंगे। आप की कमाई कम या ज्यादा हो सकती है।

लेकिन इसके बावजूद आपको एडवांस टैक्स तो अदा करना ही है। नहीं तो उसमें हुई देरी पर  12% सालाना की दर से पेनाल्टी देनी पड़ सकती है। इसलिए सबसे अच्छा तरीका ये है कि जिस समय तक आपने जितना कमाया है उस पर टैक्स दे दें। 15 सितंबर तक जितना कमाया उस पर टैक्स दे दें। 15 मार्च को साल खत्म होने के करीब आने पर आप अपनी आमदनी में का सही अनुमान लगा सकते हैं अब उसके आधार पर टैक्स दे दें। अगर आपने वित्त वर्ष के लिए ज्यादा एडवांस टैक्स भर दिया है तो आप अपने एडवांस टैक्स पर रिफंड मांग सकते हैं। आयकर विभाग टैक्स रिफंड काफी जल्दी से दे देता है। 

आप एडवांस टैक्स का ऑनलाइन पेमेंट नीचे दिए गए चालान पर क्लिक करके कर सकते हैं 

अपने टैक्स का एडवांस टैक्स की गणना करने के लिए आपको हम एक लिंक दे रहे हैं 

इस लिंक के जरिए आप देख सकते हैं कि आप एडवांस टैक्स ना देने की स्थिति में इंटरेस्ट या पेनल्टी कैसे निकाली जाती है।

5.8 – बैलेंस शीट और P&L स्टेटमेंट 

जब आप अपनी ट्रेडिंग की आमदनी को बिजनेस इनकम दिखाते हैं तो किसी भी और बिजनेस की तरह आपको अपने लिए एक बिजनेस बैलेंस शीट और P&L बनाना पड़ता है, या यूं कहिए कि इस वित्त वर्ष के लिए अपना इनकम स्टेटमेंट बनाना पड़ता है। इस तरह के वित्तीय स्टेटमेंट बनाने के लिए आपके टर्नओवर और मुनाफे पर का ऑडिट जरूरी हो सकता है। हम इस पर अगले अध्याय में विस्तार से चर्चा करेंगे। 

5.9 – टर्नओवर और टैक्स ऑडिट 

ऑडिट की जरूरत कब पड़ती है? 

ऑडिट की जरूरत तब पड़ती है जब आपके पास बिजनेस इनकम हो और वित्त वर्ष में आपके बिजनेस का टर्नओवर 5 करोड़ से ज्यादा हो। अगर आपके सारे ट्रांजैक्शन डिजिटल हैं (इक्विटी के सारे सौदे डिजीटल होते हैं) तो फिर इस टर्नओवर की सीमा 5 करोड़ हो जाती है। इक्विटी के ट्रेडर के लिए सेक्शन 44AD के अनुसार ऐसे मामलों में भी टैक्स ऑडिट की जरूरत पड़ती है जहां टर्नओवर 5 करोड़ से कम हो लेकिन मुनाफा टर्नओवर के 6% से कम हो और साथ ही, कुल आमदनी छूट की न्यूनतम सीमा से अधिक हो।

इस पर हम अगले अध्याय में विस्तार से चर्चा करेंगे। 

लेकिन अभी यह समझ लेते हैं कि ऑडिट का वास्तव में मतलब क्या होता है 

डिक्शनरी के मुताबिक ऑडिट का मतलब है जांचना, परखना या फिर से देखना। अलग अलग कानूनों में अलग अलग तरीके के ऑडिट का प्रावधान होता है,जैसे कंपनी कानून में कंपनी की ऑडिट होती है, कॉस्ट एकाउटिंग कानून में कॉस्ट ऑडिट होती है, इसी तरह, इनकम टैक्स कानून के अनुसार अगर करदाता टर्नओवर की शर्तें पूरी करता है तो उसको अपने बिजनेस या कारोबार के अकाउंट का ऑडिट कराना होता है। 

आप इस लिंक पर क्लिक करके इनकम टैक्स वेबसाइट पर टैक्स ऑडिट से जुड़े सवालों के दिए गए जवाबों को जान सकते हैं

ऑडिट का एक मतलब यह भी होता है कि आप एक अकाउंटेंट से अपने पूरे अकाउंट की जांच कराएं और देखें कि उसे सही तरीके से बनाया गया है या नहीं। यहां पर आपको जांच करनी होगी कि आपने अपनी बैलेंसशीट और P&L स्टेटमेंट सही तरीके से बनाई है। वैसे तो, यह जांच इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की तरफ से की जानी चाहिए लेकिन उनके पास इतनी ज्यादा फाइनेंशियल स्टेटमेंट आते हैं कि उनके लिए यह असंभव है कि वह हर एक बैलेंसशीट की सही तरीके से ऑडिट कर सकें। इसीलिए हमें एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की जरूरत पड़ती है जो कि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की तरफ से अधिकृत होता है कि वह आपके बैलेंस शीट और P&L स्टेटमेंट का ऑडिट कर सकें। टैक्सपेयर के तौर पर आप किसी भी चार्टर्ड अकाउंटेंट की सेवा ले सकते हैं। 

एक चार्टर्ड अकाउंट क्या भूमिका अदा करता है 

वैसे तो चार्टर्ड अकाउंटेंट का काम आप की बैलेंसशीट और P&L स्टेटमेंट की जांच यानी ऑडिट करना और उस पर हस्ताक्षर करने का ही होता है, लेकिन आमतौर पर एक चार्टर्ड अकाउंटेंट आपकी बैलेंसशीट और P&L स्टेटमेंट को बनाता भी है और उसको ऑडिट भी करता है। हम अगले अध्याय में बताएंगे कि चार्टर्ड अकाउंटेंट यह काम कैसे करता है। 

चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा की जाने वाली ऑडिट प्रक्रिया को कम नहीं आंक सकते। यह बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। यह आपकी कानूनी जरूरत को पूरा करता ही है लेकिन इसके अलावा यह आपकी वित्तीय हालत को भी सही-सही आंकता है। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करता है कि आपकी आमदनी और जितनी भी टैक्स छूट आपने मांगी है वह सही तरीके से की गई है। इसके अलावा, आपकी वित्तीय साख का आकलन भी करता है जिससे कि किसी भी तरह की धोखाधड़ी को रोका जा सके।

किस ITR फॉर्म का इस्तेमाल करें – ITR 3 (2016 तक ITR 4), हम इसके बारे में अंतिम अध्याय में ज्यादा विस्तार में बताएंगे। मेरे सामने कई ऐसे मामले आ चुके हैं जिसमें लोगों ने अपनी सट्टा आमदनी और गैर सट्टा आमदनी दोनों को कैपिटल गेन के तौर पर दिखाया है जिससे उनको बिजनेस इनकम ना दिखाना हो और ITR 3 का फॉर्म ना भरना पड़े, इस तरह का शॉर्टकट लेना कई बार मुश्किल में डाल सकता है, खासकर अगर आप के फॉर्म की स्क्रूटनी हो जाए। 

ट्रेडिंग करते समय बिजनेस के खर्चे – ट्रेडिंग को बिजनेस आमदनी दिखाने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि आप अपने सारे खर्चों को दिखा कर उस पर टैक्स छूट ले सकते हैं और टैक्स कम कर सकते हैं। अगर इन सारे खर्चों के बाद आपको नुकसान हुआ है तो आप उस नुकसान को अगले सालों के लिए कैरी फॉरवर्ड कर सकते हैं, जैसे कि हमने ऊपर बताया है। 

नीचे की लिस्ट में कुछ खर्च बताए गए हैं जिनको आप अपने ट्रेडिंग के खर्च के तौर पर दिखा सकते हैं 

  • ट्रेडिंग के दौरान लगने वाले सभी शुल्क (STT, ब्रोकरेज, एक्सचेंज के शुल्क और दूसरे तरीके के टैक्स) ,आपको याद होगा तो मैंने कहा था कि जब आप अपनी आमदनी को कैपिटल गेन के तौर पर दिखा रहे हैं  तो STT को खर्च के तौर पर नहीं दिखाया जा सकता लेकिन अगर आपने अपनी आमदनी को बिजनेस इनकम दिखाया है तो STT को खर्चों में शामिल किया जा सकता है। 
  • इंटरनेट और फोन के बिल (अगर इनका इस्तेमाल ट्रेडिंग के लिए हुआ है तो बिल का उतना हिस्सा)
  • कंप्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामान का डेप्रिसिएशन (ट्रेडिंग के लिए इस्तेमाल हुए) 
  • किराया (अगर ट्रेडिंग के लिए आप अपने कमरे का एक हिस्सा इस्तेमाल करते हैं तो आपकी किराए का एक किस्सा) 
  • अपना ट्रेड करने के लिए किसी और की मदद लेते हैं तो उसको दिया गया वेतन 
  • सलाह यानी एडवाइजरी की फीस, किताबें, समाचारपत्र और दूसरे ऐसी चीजें

इस अध्याय की मुख्य बातें 

  1. अगर इक्विटी में इंट्राडे ट्रेडिंग करते हैं तो यह सट्टा व्यवसाय आमदनी है। 
  2. अगर F&O में ट्रेडिंग करते हैं या इक्विटी में शॉर्ट टर्म डिलीवरी ट्रेडिंग करते हैं तो यह गैर सट्टा व्यवसाय आमदनी है। 
  3. सट्टा व्यवसाय से होने वाले नुकसान को गैर सट्टा व्यवसाय आमदनी से ऑफसेट से नहीं किया जा सकता। 
  4. ट्रेडिंग के बिजनेस से होने वाली आमदनी का एडवांस टैक्स देना पड़ता है 15 जून तक 15% ,15 सितंबर तक 45%, 15 दिसंबर तक 75% और 15 मार्च तक 100% 
  5. ट्रेडिंग को बिजनेस इनकम दिखाने पर इसमें होने वाले सभी खर्च को आप क्लेम कर सकते हैं।

डिस्क्लेमर- अपने रिटर्न फाइल करने के पहले एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की सलाह जरूर लें। यहाँ दी गई जानकारी सिर्फ समझाने के लिए है। 

15 comments

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  1. Bhavesh sharma says:

    Agar hamare itr bharne me koi galti hui ho aur income tax kam bhara ho to kya wo CA ke uper aata h yeah hamere uper

  2. SYED JUWAIRIA FATIMA says:

    Sir,
    Please provide PDFs of all the modules in Hindi as you provide only in English.

    Thanks

    • Kulsum Khan says:

      बाकि मॉड्यूल्स पर हम काम कर रहे हैं, वे भी जल्द ही उपलब्ध कराये जाएंगे.

  3. VISHAL SHARMA (CA) says:

    बहुत से लोग F&O में काम करते है और उनको loss भी होता है किंतु ऑडिट करवाने के फायदे ( जैसे loss को आगे carry forward करना ) से अनजान रहते है जिसका उन्हें बाद में नुकसान उठाना पड़ता हैं … दूसरा कई लोग F&O में छोटे छोटे ही लेनदेन करते है किन्तु वर्ष के अंत तक उनका turnover , audit की सीमा तक हो जाता है (ICAI की guidelines के अनुसार) जिसका भी नुकसान जैसे ऑडिट न कराने की पेनल्टी के रूप में चुकाना पड़ता है …… इसलिए इसका विशेष ध्यान रखे …. ध्यान रहे F&O की टर्नओवर की calculation के नियम अलग है

    किसी भी सहायता के लिए आप https://www.facebook.com/fcavishalksharma/ पर पूछ सकते हैं

  4. Vikas says:

    Sir, entrada me to sare charges tax lag jate hai turant fir year ke end me bhi dena padta hai charge kya

    • Kulsum Khan says:

      जी हाँ दिन के अंत में उसको स्क्वायर ऑफ करना होगा वर्ण आपका पोजीशन सिस्टम से ही स्क्वायर ऑफ होजायेगा।

  5. Vikas says:

    Entrada ki jagah intraday hai

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