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Chapter 2

फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट (Futures Contract)

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2.1 – भूमिका

पिछले अध्याय में अनेक सीधे-साधे फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट का उदाहरण देखा था, जहां दो पार्टी एक दूसरे से एक समझौता करती हैं कि भविष्य में एक पार्टी कुछ माल देगी और दूसरी पार्टी उस माल के बदले कुछ पैसा देगी। हमने देखा कि ऐसा  समझौता कैसे होता है और कीमत में होने वाले बदलाव का इन पार्टियों पर क्या असर पड़ता है। अध्याय के अंत में हमने फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट के चार रिस्क या कमियों पर भी नजर डाली थी और यह भी बात की थी कि फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट को इसी लिए बनाया गया जिससे इन को दूर किया जा सके:

  1. लिक्विडिटी रिस्क  (Liquidity Risk)
  2. डिफॉल्ट रिस्क (Default Risk)
  3. रेगुलेटरी रिस्क (Regulatory Risk)
  4. इस समझौते की कठोरता या कड़े नियम (Rigidity of the transitional structure)

एक बात साफ है अगर आप किसी वस्तु की भविष्य की कीमत के बारे में कोई राय रखते हैं तो आप एक फॉरवर्ड समझौते में पैसे कमा सकते हैं। बस आपको एक ऐसी पार्टी ढूंढनी है जिसकी राय आपकी राय से विपरीत हो। हालांकि यह भी साफ है कि फॉरवर्ड एग्रीमेंट में कुछ कमियां होती हैं और उन कमियों से बचने के लिए ही फ्यूचर एग्रीमेंट को लाया गया है।

फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट को फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट का ही सुधरा हुआ रूप कहा जा सकता है इसको इस तरह से बनाया गया है कि फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट की खूबियां तो बनी रहे लेकिन उसकी कमियां दूर हो जाएं। मतलब फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट में भी आप फायदा कमा सकते हैं अगर आपकी किसी भी वस्तु की भविष्य  की कीमत के बारे में एक ठोस राय हो।

इसको एक उदाहरण से समझें। पुराने जमाने में कार का काम था लोगों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना। नए जमाने की कार लोगों को एक जगह से दूसरी जगह तो ले ही जाती है लेकिन साथ में उसमें कई तरह की दूसरी सुविधाएं भी होती हैं जैसे सीट बेल्ट, एयर बैग, पावर स्टीयरिंग आदि। फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट और फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट में कुछ इसी तरह का अंतर है।

2.2 – फ्यूचर एग्रीमेंट पर एक नजर

जैसा कि अब हमें पता है कि फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट और फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट का आधार एक ही है। इसलिए फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट को अच्छे से समझने का एक तरीका यह हो सकता है कि हम इन दोनों के अंतर को समझें। 

हमने पिछले अध्याय में एक उदाहरण लिया था जहां पर ABC ज्वेलर्स ने XYZ गोल्ड सेलर से एक समझौता किया था कि वह एक निश्चित समय के बाद कुछ सोना खरीदेगा। अब जरा कल्पना कीजिए कि ABC को ऐसी कोई पार्टी नहीं मिलती जिससे वह यह समझौता कर पाता, तो क्या होता? ABC की सोने के भविष्य के बारे में एक राय है और वह एक समझौता करना चाहते हैं लेकिन उन्हें कोई ऐसा नहीं मिल रहा है जिससे वह समझौता कर सके।

अब मान लीजिए कि ABC नई पार्टी को ढूंढने में समय लगाने के बजाय तय करती है कि वो एक ऐसे सुपर मार्केट में जाएगी, जहां पर बहुत सारे लोग समझौता करने के लिए दूसरी पार्टी को ढूंढ रहे हैं। अब इस सुपर मार्केट में ABC को सिर्फ यह घोषणा करनी है कि मेरी सोने पर यह राय है और जिसको इस राय के विपरीत आकर समझौता करना है वह आए। इसके अलावा यह भी मान लीजिए कि इस सुपर बाजार में बहुत सारे लोग हैं जिनकी केवल सोने पर ही नहीं चांदी, तेल, तांबे जैसी हर वस्तु और यहाँ तक स्टॉक्स पर एक राय है और वह एक समझौता करने के लिए किसी पार्टी को ढूंढ रहे हैं। 

फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट इसी तरीके से किए जाते हैं। ये ABC ज्वैलर जैसी किसी एक कंपनी को नहीं बल्कि हर एक व्यक्ति को उपलब्ध हैं जो ऐसा समझौता करना चाहता है। इस सुपर मार्केट या सुपर बाजार को ही हम आम भाषा में हम एक्सचेंज कहते हैं। यह स्टॉक एक्सचेंज भी हो सकता है और कमोडिटी एक्सचेंज भी।

जैसा कि हमें पता है कि फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट को इसलिए लाया गया क्योंकि फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट में कुछ कमियां थी और उनको दूर करना जरूरी था। आइए अब देखते हैं कि फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट में ऐसी कौन सी चीजें हैं जो फॉरवर्ड कांट्रैक्ट से अलग है।

हो सकता है कि इनमें से कुछ बातें आप को अभी समझ में ना आएं। लेकिन बाद में जब हम आपको उदाहरण देंगे तो आपके लिए समझना आसान होगा। फिलहाल के लिए आप एक बार इनके अंतर को देख लीजिए। 

फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट अंडरलाइंग एसेट के साथ ऊपर नीचे होते हैं हमारे ABC ज्वेलर वाले उदाहरण में एक एसेट यानी सोना और उसकी कीमत को ले कर ABC और XYZ  के बीच में एक फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट हुआ था। फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट में एसेट के रूप में सोने की जगह “सोने का फ्यूचर” ही हो सकता है और सोना उसका अंडरलाइंग होगा। अब जब भी सोने की कीमत ऊपर या नीचे होगी तो एसेट यानी “सोने का फ्यूचर” की कीमत भी ऊपर या नीचे होगी। 

एक समान कॉन्ट्रैक्ट हमने देखा था कि ABC ज्वेलर वाले उदाहरण में ABC और XYZ के बीच जो समझौता हुआ था वह 15 किलो सोने का था। लेकिन यह समझौता 14.5 किलो या 15.5 किलो या 15.2 किलो का भी हो सकता था यानी यह समझौता दोनों पार्टियों की सहूलियत के हिसाब से बदला जा सकता था। लेकिन फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट में ऐसा नहीं होता यह समझौता सबके लिए एक समान होता है और वैसे ही बाजार में उपलब्ध होते हैं।

फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट बाजार में बेचे और खरीदे जा सकते हैं फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट किसी को भी बेचे और खरीदे जा सकते हैं। अगर मैंने किसी दूसरे के साथ फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट किया है तो भी यहां मैं उस कॉन्ट्रैक्ट से कभी भी निकल सकता हूं, अगर मेरे कॉन्ट्रैक्ट को खरीदने वाला कोई बाजार में मौजूद हो। जबकि फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट में मुझे अपने कॉन्ट्रैक्ट यानी समझौते को पूरा करना जरूरी होता भले ही मेरी अपने एसेट के बारे में या उसकी कीमत के बारे में राय बदल गई हो।

फ्यूचर मार्केट नियमों से नियंत्रित होता है–  फ्यूचर मार्केट और फाइनेंशियल डेरिवेटिव्स मार्केट एक नियामक प्राधिकरण या रेगुलेटरी अथॉरिटी से नियंत्रित होता है।  भारत में यह काम SEBI (सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) करती है। नियंत्रित होने की वजह से इस बाजार में गड़बड़ी की गुंजाइश कम रहती है।

फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट का समय निर्धारित होता है सभी तरह के फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट किसी न किसी समय सीमा से निर्धारित होते हैं। ABC ज्वैलर और XYZ वाले उदाहरण को देखें तो वहां यह कॉन्ट्रैक्ट 3 महीने का था लेकिन अगर यही कॉन्ट्रैक्ट किसी फ्यूचर मार्केट में किया जाए तो वहां पर 1 महीने 2 महीने 3 महीने जैसी अलग-अलग अवधि के कॉन्ट्रैक्ट उपलब्ध होते हैं। जब कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो रहा होता है तो उसको एक्सपायरी कहते हैं।

कैश सेटेलमेंट फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट का सेटलमेंट कैश में होता है इसका मतलब कि दोनों कीमतों के बीच का अंतर ही कैश में अदा करना होता है। इसमें किसी भौतिक एसेट की एक जगह से दूसरी जगह डिलीवरी नहीं होती है और यह कैश सेटेलमेंट बाजार को नियंत्रित करने वाले नियामक प्राधिकरण के देखरेख में होता है।

इन सारे बिंदुओं को एक टेबल के रूप में देखते हैं

फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट
कॉन्ट्रैक्ट का करोबार OTC / ओवर द काउंटर (over the counter) होता है फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट एक्सचेंज पर खरीदे बेचे जाते हैं
कॉन्ट्रैक्ट जरूरत के हिसाब से बनाए जा सकते हैं  फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट हमेशा एक समान होते हैं
सामने वाली पार्टी से जुड़ा बड़ा रिस्क सामने वाली पार्टी से रिस्क नहीं
बाजार नियंत्रित नहीं SEBI के नियंत्रण में
कॉन्ट्रैक्ट किसी और को हस्तांतरित नहीं किए जा सकते  कॉन्ट्रैक्ट किसी को भी हस्तांतरित  किए जा सकते हैं, बेचना खरीदना संभव
सिर्फ एक तय समय अवधि अलग अलग समय अवधि के कॉन्ट्रैक्ट संभव
कैश और भौतिक सेटलमेंट संभव सिर्फ कैश सेटलमेंट

 

यहां पर आपको एक और बहुत महत्वपूर्ण बात जान लेनी चाहिए, वह है स्पॉट कीमत और फ्यूचर कीमत का अंतर। कोई भी एसेट आम बाजार में जिस कीमत पर बिकता है वह कीमत स्पॉट कीमत कही जाती है। उदाहरण के लिए जब हम सोने को अंडरलाइंग एसेट के तौर पर देखते हैं तो हम सोने की दो कीमतों के बारे में बात कर रहे हैं- एक कीमत जिस पर सोना आम बाजार में बिक रहा है जिसे स्पॉट कीमत कहेंगे और दूसरी कीमत जिस पर सोना फ्यूचर बाजार में बिक रहा है जिसे हम फ्यूचर कीमत कहेंगे। आमतौर पर स्पॉट कीमत और फ्यूचर कीमत एक साथ ही चलते हैं एक ऊपर या नीचे होता है तो दूसरा भी ऊपर या नीचे होता है।

अब फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट की कुछ और महत्वपूर्ण बातों को समझते हैं।

2.3 – कुछ और जरूरी बातें 

फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट के बारे में और गहराई से जानने से पहले कुछ और बातों को जानना जरूरी है। वैसे इन बातों को हम बाद में और विस्तार से जानेंगे, लेकिन यहां उनको मोटे तौर पर समझ लेते हैं।

लॉट साइज (Lot Size) जैसा कि हम पहले भी बात कर चुके हैं कि फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट सबके लिए एक समान होते हैं इसलिए उनमें कुछ बातें निश्चित होती हैं। एक ऐसी ही चीज है लॉट साइज। लॉट साइज हमें यह बताता है कि हर सौदे में आप कम से कम कितने मात्रा का समझौता कर रहे हैं। लॉट साइज हर एसेट के लिए अलग अलग होता है लेकिन एक एसेट में एक समान। 

कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू (Contract Value) या कॉन्ट्रैक्ट की कीमत ABC और XYZ वाले उदाहरण में ABC ने 15 किलो सोना 2450 रुपए प्रति ग्राम यानी 24,50,000 रुपए प्रति किलोग्राम की दर पर खरीदने का कॉन्ट्रैक्ट किया था। इस कीमत पर 15 किलो सोने की कीमत हुई 3.675 करोड़ तो यहां पर कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू  थी 3.675 करोड़ रुपए मतलब मात्रा (15 किलोग्राम) और कीमत (24,50,000) का गुणक ( मात्रा × कीमत)। चूंकि फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट एक समान होते हैं यानी वहां मात्रा निश्चित होती हैं इसलिए एक फ्यूचर एग्रीमेंट या समझौते का कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू होगा लॉट साइज × कीमत

मार्जिन (Margin)– ABC और XYZ वाले उदाहरण में दोनों के बीच 9 दिसंबर 2014 को एक समझौता हुआ जो 9 मार्च 2015 को एक्सपायर होना था। सौदे के लिए दोनों पार्टियों ने एक दूसरे को वचन दिया लेकिन इसके अलावा और कोई लेन-देन नहीं हुआ था। 

लेकिन फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट में ऐसा नहीं होता है। फ्यूचर एग्रीमेंट में आप जैसे ही सौदा करते हैं, दोनों ही पार्टी कुछ पैसे जमा करती हैं। इसे आप टोकन या एडवांस जैसी चीज मान सकते हैं। यह पैसा ब्रोकर के पास जमा किया जाता है और यह सौदे की कीमत का एक निश्चित प्रतिशत होती है। इस रकम को मार्जिन अमाउंट या मार्जिन कहते हैं। यह फ्यूचर सौदे की एक बहुत ही महत्वपूर्ण चीज है।

एक्सपायरी (Expiry) जैसा कि हमें पता है कि फ्यूचर सौदे एक निश्चित समय के लिए होते हैं। जिस दिन यह समझौता खत्म होता है उस दिन को एक्सपायरी कहते हैं। याद रखिए कि जिस दिन यह सौदा एक्सपायर होता है उसी दिन नया सौदा एक्सचेंज पर मिलने लगता है।

अगले अध्याय में हम फ्यूचर सौदे के उदाहरणों पर नजर डालेंगे।

इस अध्याय की मुख्य बातें 

  1. अगर आप किसी एसेट की कीमत के बारे में एक निश्चित राय रखते हैं तो तो फॉरवर्ड या फ्यूचर मार्केट में आप फायदा कमा सकते हैं।
  2. फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट का ही सुधरा हुआ रूप है फ्यूचर कांट्रैक्ट । 
  3. फ्यूचर कीमतें आम तौर पर अंडरलाइंग एसेट की कीमत के साथ ऊपर नीचे होती हैं। 
  4. फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट खरीदे और बेचे जा सकते हैं।
  5. हर फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट की शर्तें एक समान होती हैं जिससे समझौता पहले से निश्चित शर्तों पर  हो सके। 
  6. फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट एक निश्चित समय के लिए होता है और यह अलग अलग समय अवधि के लिए मिल सकता है। 
  7. अधिकतर फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट कैश में ही सेटल होते हैं। 
  8. भारत में फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट को सेबी (SEBI)  नियंत्रित करता है। 
  9. एक फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट की कम से कम मात्रा को लॉट साइज कहते हैं। 
  10. कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू = लॉट साइज × फ्यूचर कीमत 
  11. कोई भी फ्यूचर एग्रीमेंट करने के लिए आपको सौदे की कीमत की एक निश्चित प्रतिशत रकम जमा करानी होती है जिसको मार्जिन कहते हैं। 
  12. हर फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट एक निश्चित तारीख को समाप्त हो जाता है और उसी समय नए फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट बाजार में मिलने लगते हैं।
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